पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 19

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 19

भुवण पति थें घरि आज्याँ जी

भुवण पति थें घरि आज्याँ जी
बिथा लगाँ तण जराँ जीवण, तपता बिरह बुझाज्याँ जी।।टेक।।
रोवत रोवत डोलताँ सब रैण बिहावाँ की।
भूख गयाँ निदरा गयाँ पापी जीव णा जावाँ जी।
दुखिया णा सुखिया करो, म्हाणो दरसण दीज्याँ जी।
मीराँ व्याकुल बिरहणी, अब बिलम णा कीज्याँ जी।।

भजु मन चरन कँवल अविनासी

भजु मन चरन कँवल अविनासी।
जेताइ दीसे धरण-गगन-बिच, तेताई सब उठि जासी।
कहा भयो तीरथ व्रत कीन्हे, कहा लिये करवत कासी।
इस देही का गरब न करना, माटी मैं मिल जासी।
यो संसार चहर की बाजी, साँझ पडयाँ उठ जासी।
कहा भयो है भगवा पहरयाँ, घर तज भए सन्यासी।
जोगी होय जुगति नहिं जाणी, उलटि जनम फिर जासी।
अरज करूँ अबला कर जोरें, स्याम तुम्हारी दासी।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, काटो जम की फाँसी।

पाठांतर
भज मण चरण कंवल अवणासी
जेतांई दीसां धरण गगण मां तेताई उठ जासी
तीरथ बरतां ग्याण कथन्तां कहा लयां करवत कासी
यो देही रो गरब णा करणा माटी मा मिलजासी
यो संसार चहर रो बाजी सांझ पडयां उठ जासी
कहाँ भया था भगवां पहर्यां घर तज भये सण्यासी
जोगी होयाँ जुगत णा जाणा उलट जणम रां फांसी
अरज करां अबला कर जोड़याँ स्याम दासी
मीरां रे प्रभु गिरधर नागर, काढयां म्हारी गांसी।

बादल देख डरी

बादल देख डरी हो, स्याम, मैं बादल देख डरी ।
श्याम मैं बादल देख डरी ।
काली-पीली घटा ऊमड़ी बरस्यो एक घरी ।
जित जाऊं तित पाणी पाणी हुई सब भोम हरी ।
जाके पिया परदेस बसत है भीजे बाहर खरी ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर कीजो प्रीत खरी ।
श्याम मैं बादल देख डरी ।

पाठांतर
बादल देखाँ झरी स्याम मैं बादल देखाँ झरी।।टेक।।
काला पीला घट्या उमड्या बरस्यौ चार धरी।
जित जोयाँ तित पाणी पाणी बप्यासा भूम हरी।
म्हारा पिया परदेसाँ बसताँ, भीज्यां बार खरी।
मीराँ रे प्रभु हरि अबिनासी, करस्यों प्रती खरी।।

ब्रजलीला लख जण सुख पावाँ

ब्रजलीला लख जण सुख पावाँ, ब्रजबणताँ सुखरासी।
णाच्याँ गावाँ ताल बजावाँ, पावाँ आणद हाँसी।
णन्द जसोदा पुन्न रो प्रगटह्याँ, प्रभु अविनासी।
पीताम्बर कट उर बैजणताँ, कर सोहाँ री बाँसी।।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर, दरसण दीज्यो दासी।।

बरजी मैं काहूकी नाहिं रहूं

बरजी मैं काहूकी नाहिं रहूं।
सुणो री सखी तुम चेतन होयकै मनकी बात कहूं॥
साध संगति कर हरि सुख लेऊं जगसूं दूर रहूं।
तन धन मेरो सबही जावो भल मेरो सीस लहूं॥
मन मेरो लागो सुमरण सेती सबका मैं बोल सहूं।
मीरा के प्रभु हरि अविनासी सतगुर सरण गहूं॥

पाठांतर
बरजी री म्हां स्याम बिणा न रह्यां।।टेक।।
साधां संगत हरि सुख पास्यू जग सूं दूर रह्यां।
तम मण म्हारां जावाँ जास्यां, म्हारो सीस लह्यां।
मण म्हारो लाग्यां गिरधारी जगरा बोल सह्यां।
मीरां रे प्रभु हरि अबिनासी, थारी सरण गह्यां।।

फागुन के दिन चार होली खेल मना रे

फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे।
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे॥
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीराके प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे॥

पिया म्हाँरे नैणा आगां रहज्यो जी

पिया म्हाँरे नैणा आगां रहज्यो जी।।टेक।।
नैणाँ आगाँ रहज्यो, म्हाँणो भूल णो जाज्यो जी।
भौ सागर म्हाँ बूड्या चाहाँ, स्याम बेग सुब लीज्यो जी।
राणा भेज्या विष रो प्यालो, थें इमरत वर दीज्यो जी।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर, मिल बछूडन मत कीज्यो जी।।

पिया इतनी बिनती सुनो मोरी

पिया इतनी बिनती सुनो मोरी, कोई कहियो रे जाय ।।टेक।।
और सूं रस बतियाँ करत हो, हम से रहै चित्त चोरी।
तुम बिन मेरे और न कोई, में सरनागत तोरी।
आवन कह गए अजहूँ न आये, दिवस रहे अब थोरी।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, अरज करूँ कर जोरी।।

प्रेमनी प्रेमनी प्रेमनी रे, मन

प्रेमनी प्रेमनी प्रेमनी रे, मने लागी कटारी प्रेमनी।।टेक।।
जल जुमनामां भरवा गयाँताँ हती नागर माथे हेमनी रे।
काचे तें तातणे हरिजीए बाँधी, जेम खेंचे तेम तेमनी रे।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, शामली सुरत शुभ गमनी रे।।

पपइया म्हारो कबह रो बैर चितारयाँ

पपइया म्हारो कबह रो बैर चितारयाँ।।टेक।।
म्हा सोवूं छी अपणे भवण माँ पियु पियु करताँ पुकारयाँ।
दाध्या ऊपर लूण लगायाँ, हिवड़ो करवत सारयाँ।
ऊभाँ बेठयाँ बिरछरी डाली, बोला कंठणा सारयाँ।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर, हरि चरणां चित धारयाँ।।

 

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