पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 16

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पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 16

पतियाँ मै कैसे लिखूँ

पतियाँ मै कैसे लिखूँ, लिख्योरी न जाय।।टेक।।
कलम धरत मेरो कर कँपत है नैन रहे झड़ लाय।
बात कहुँ तो कहत न आवै, जीव रह्यो डरराय।
बिपत हमारी देख तुम चाले, कहिया हरिजी सूं जाय।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर चरण कमल रखाय ।।

पाठांतर
पतीया मैं कैशी लीखूं, लीखये न जातरे॥टेक॥
कलम धरत मेरा कर कांपत। नयनमों रड छायो॥१॥
हमारी बीपत उद्धव देखी जात है। हरीसो कहूं वो जानत है॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल रहो छाये॥३॥

 पपइया रे, पिव की वाणि न बोल

पपइया रे, पिव की वाणि न बोल।
सुणि पावेली बिरहुणी रे, थारी रालेली पांख मरोड़॥
चोंच कटाऊं पपइया रे, ऊपर कालोर लूण।
पिव मेरा मैं पीव की रे, तू पिव कहै स कूण॥
थारा सबद सुहावणा रे, जो पिव मेंला आज।
चोंच मंढ़ाऊं थारी सोवनी रे, तू मेरे सिरताज॥
प्रीतम कूं पतियां लिखूं रे, कागा तू ले जाय।
जाइ प्रीतम जासूं यूं कहै रे, थांरि बिरहस धान न खाय॥
मीरा दासी व्याकुल रे, पिव पिव करत बिहाय।
बेगि मिलो प्रभु अंतरजामी, तुम विन रह्यौ न जाय॥

पाठांतर
पपइया रे पिव की बाणि न बोल।।टेक।।
सुणि पावेली बिरहणी रे, थारो रालैली पाँख मरोड़।
चाँच कटाऊँ पपइया रे, ऊपरि कालर लूण।
पिव मेरा मैं पीव की रे, तू पिव कहैसू कूण।
थारा सबद सुहावण रे, जो पिव मेला आज।
चाँच मढ़ाऊँ थारी सोवनी रे, तू मेरे सिरताज।
प्रीतम कूँ पतियाँ लिखूँ, कउवा तूं ले जाइ।
जाइ प्रीतम जी सूँ यूँ कहै रे, थाँरी बिरहणि धान न खाइ।
मीराँ दासी व्याकुली रे, पिव पिव करत बिराइ।
बेगि मिलो प्रभु अंतरजामी तुम बिनि रह्यो ही न जाइ।।

प्रगट भयो भगवान

प्रगट भयो भगवान॥टेक॥
नंदजीके घर नौबद बाजे। टाळ मृदंग और तान॥१॥
सबही राजे मिलन आवे। छांड दिये अभिमान॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। निशिदिनीं धरिजे ध्यान॥३॥

प्रभुजी थें कहाँ गया, नेहड़ो लगाय

प्रभुजी थें कहाँ गया, नेहड़ो लगाय।
छोड़ गया बिस्वास संगाती प्रेम की बाती बलाय।।
बिरह समंद में छोड़ गया छो नेहकी नाव चलाय।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे तुम बिन रह्यो न जाय।।

पाठांतर
प्रभुजी थें कहाँ गया नेहड़ा लगाय।।टेक।।
छोड़या म्हाँ विस्वास सँघाती, प्रेम री बाती जलाय।
बिरह समेद में छोड़ गया छो, नेह री नाव चलाय।
मीराँ रे प्रभु कबेर मिलोगे थे बिण रह्याँ ण जाय।।

प्रभु तुम कैसे दीनदयाळ॥टेक॥

प्रभु तुम कैसे दीनदयाळ॥टेक॥
मथुरा नगरीमों राज करत है बैठे। नंदके लाल॥१॥
भक्तनके दुःख जानत नहीं। खेले गोपी गवाल॥२॥
मीरा कहे प्रभू गिरिधर नागर। भक्तनके प्रतिपाल॥३॥

प्रभु सों मिलन कैसे होय

प्रभु सों मिलन कैसे होय।।टेक।।
पाँच पहर धन्धे में थीते, तीन पहर रहे सोय।
मानख जनम अमोलक पायो, सोतै सीतै डार्यो खोय।
मीराँ के प्रभु गिरधर भजीये होनी होय सो होय।।

पलक न लागी मेरी स्याम बिना

पलक न लागी मेरी स्याम बिना ।।टेक।।
हरि बिनु मथुरा ऐसी लागै, शसि बिन रैन अँधेरी।
पात पात वृन्दावन ढूंढ्यो, कुँज कुँज ब्रज केरी।
ऊँचे खड़े मथुरा नगरी, तले बहै जमना गहरी।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर हरि चरणन की चेरी।।

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस गायो॥

पिया अब घर आज्यो मेरे

पिया अब घर आज्यो मेरे, तुम मोरे हूँ तोरे।।टेक।।
मैं जन तेरा पंथ निहारूँ, मारग चितवत तोर।
अवध बदीती अजहुँ न आये, दूतियन सूँ नेह जोरे।
मीराँ कहे प्रभु कबरे मिलोगे, दरसन बिन दिन दोरे।।

  पिया थारो नाम लुभाणी जी

  पिया थारो नाम लुभाणी जी

पिया थारो नाम लुभाणी जी।।टेक।।
नाम लेतां तिरतां सुण्यां जग पाहण पाणी जी।
कीरत कांइ णा किया, घमआ करम कुमाणी जी।
गणका कीर पढ़ावतां, बैकुण्ठ बसाणी जी।
अधर नाम कुन्जर लयां, दुख अवध घटाणी जी।
गरुण छांड पग घाइयां, पसुजूबण पटाणीं जी।
अजांमेल अध ऊधरे, जम त्रास णसानी जी।
पुतनाम जम गाइयां, गज मारा जाणी जी।
सरणागत थे वर दिया, परतीत पिछाणी जी।
मीराँ दासी रावली, अपणी कर जाणी जी।।

पिया मोहिं दरसण दीजै, हो

पिया मोहिं दरसण दीजै, हो।
बेर बेर में टेरहूँ, अहे क्रिया कीजै, हो।।टेक।।
जेठ महीने जल बिना, पंछी दुख होई, हो।
मोर आसाढ़ा कुरलहे, धन चात्रग सोई, हो।
सावण में झड़ गालियो, सखि तीजाँ केलै, हो।
भादवै नदिया बहै, दूरी जिन मेलै, हो।
सीप स्वाति ही भेलती, आसोजाँ सोई, हो।
देव काती में पूजहे, मेरे तुम होई, हो।
मगसर ठंड बहोंती पड़ै, मोहि बेगि सम्हालो हो।
पोस मही पाल घणा, अबही तुम न्हालो हो।
महा महीं बसंत पंचमी, फागाँ सब गावै हो।
फागुण फागा खेल है, बणराइ जरावै हो।
चैत चित्त में ऊपजी, दरसण तुम दीजे हो।
बैसाख बणराइ फलवै, कोइल कुरलीजै, हो।
काग उडावन दिय गाय, बूनूँ पिडत जोसी हो।
मीराँ बिरहणि व्याकुली, दरसण कब होसी हो।।

पिहु की बोलि न बोल

पिहु की बोलि न बोल पपैय्या॥टेक॥
तै खोलना मेरा जी डरत है। तनमन डावा डोल॥१॥
तोरे बिना मोकूं पीर आवत है। जावरा करुंगी मैं मोल॥२॥
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर। कामनी करत कीलोल॥३॥

फरका फरका जो बाजी हरी की मुरलीया

फरका फरका जो बाजी हरी की मुरलीया, सुनोरे सखी मारा मन हरलीया॥टेक॥
गोकुल बाजी ब्रिंदाबन बाजी। और बाजी जाहा मथुरा नगरीया॥१॥
तुम तो बेटो नंदबावांके। हम बृषभान पुराके गुजरीया॥२॥
यहां मधुबनके कटा डारूं बांस। उपजे न बांस मुरलीया॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमलकी लेऊंगी बलय्या॥४॥

फूल मंगाऊं हार बनाऊं

फूल मंगाऊं हार बनाऊं। मालीन बनकर जाऊं॥१॥
कै गुन ले समजाऊं। राजधन कै गुन ले समजाऊं॥२॥
गला सैली हात सुमरनी। जपत जपत घर जाऊं॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। बैठत हरिगुन गाऊं॥४॥

बरसै बदरिया सावन की

बरसै बदरिया सावन की,
सावन की मनभावन की ।
सावन में उमग्यो मेरो मनवा,
भनक सुनी हरि आवन की ॥
उमड घुमड चहुं दिस से आयो,
दामण दमके झर लावन की ।
नान्हीं नान्हीं बूंदन मेहा बरसै,
सीतल पवन सुहावन की ॥
मीरा के प्रभु गिरघर नागर,
आनन्द मंगल गावन की ॥

पाठांतर
बरसां री बादरिआ सावन री, सावन री मण भावन री।।टेक।।
सावन मां उमँग्यो मणरी, भणक सुण्या हरि आवन री।
उमड़ घुमड़ घण मेघां आयां, दामण घण झर लावण री।
बीजां बूँदां मेहां आयां बरसां सीतल पवण सुहावण री।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, बेला मंगल गावण री।।

बसो मोरे नैनन में नंदलाल

बसो मोरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरति सांवरि सूरति, नैणा बने बिसाल।
अधर सुधारस मुरली राजत, उर बैजंती-माल।।
छुद्र घंटिका कटि तट सोभित, नूपुर सबद रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भगत बछल गोपाल।।

बंसीवारा आज्यो म्हारे देस

बंसीवारा आज्यो म्हारे देस। सांवरी सुरत वारी बेस।।
ॐ-ॐ कर गया जी, कर गया कौल अनेक।
गिणता-गिणता घस गई म्हारी आंगलिया री रेख।।
मैं बैरागिण आदिकी जी थांरे म्हारे कदको सनेस।
बिन पाणी बिन साबुण जी, होय गई धोय सफेद।।
जोगण होय जंगल सब हेरूं छोड़ा ना कुछ सैस।
तेरी सुरत के कारणे जी म्हे धर लिया भगवां भेस।।
मोर-मुकुट पीताम्बर सोहै घूंघरवाला केस।
मीरा के प्रभु गिरधर मिलियां दूनो बढ़ै सनेस।।

बादला रे थें जल भर्या आज्यो

बादला रे थें जल भर्या आज्यो।।टेक।।
झर झर बूँदा बरसां आली कोयल सबद सुनाज्यो।
गाज्यां बाज्यां पवन मधुर्यो, अम्बर बदरां छाज्यो।
सेज सवांर्या पिय घर आस्यां सखायं मंगल गास्यो।
मीरां रे हरि अबिणासी, भाग भल्यां जिण पास्यो।।

बालपनमों बैरागन करी गयोरे

बालपनमों बैरागन करी गयोरे॥टेक॥
खांदा कमलीया तो हात लकरीया। जमुनाके पार उतारगयोरे॥१॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावत। बनसीकी टेक सुनागयोरे॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सावली सुरत दरशन दे गयोरे॥३॥

बासुरी सुनूंगी

बासुरी सुनूंगी। मै तो बासुरी सुनूंगी। बनसीवालेकूं जान न देऊंगी॥टेक॥
बनसीवाला एक कहेगा। एकेक लाख सुनाऊंगी॥१॥
ब्रिंदाबनके कुजगलनमों। भर भर फूल छिनाऊंगी॥२॥
ईत गोकुल उत मथुरा नगरी। बीचमें जाय अडाऊंगी॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल लपटाऊंगी॥४॥

भज मन शंकर भोलानाथ

भज मन शंकर भोलानाथ भज मन॥टेक॥
अंग विभूत सबही शोभा। ऊपर फुलनकी बास॥१॥
एकहि लोटाभर जल चावल। चाहत ऊपर बेलकी पात॥२॥
मीरा कहे प्रभू गिरिधर नागर। पूजा करले समजे आपहि आप॥३॥

भीजो मोरी नवरंग चुनरी

भीजो मोरी नवरंग चुनरी। काना लागो तैरे नाव॥टेक॥
गोरस लेकर चली मधुरा। शिरपर घडा झोले खाव॥१॥
त्रिभंगी आसन गोवर्धन धरलीयो। छिनभर मुरली बजावे॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरन कमल चित लागो तोरे पाव॥३॥

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