पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 16

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 16

दरस बिन दूखण लागे नैन

दरस बिन दूखण लागे नैन।
जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे, कबहुं न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियां, कांपै मीठे लागै बैन।
बिरह व्यथा कांसू कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैन।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैन।

पाठांतर
दरस बिन दूखण लागे नैन ।।टेक।।
जब के तुम बिछुरे प्रभु जी, कबहूँ न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपे, मीठे मीठै बैन।
बिरह-बिथा काँसू कहूँ सजनी, बह गई करवत थैन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण।
मीरां के प्रभु कब रैं मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण।।

पाठांतर
दरस बिण दूखाँ म्हारा णैण।।टेक।।
सबदाँ सुणतां मेरी छतियाँ काँपाँ मीठों थारो बैण।
बिरह बिथा काँसूँ री कह्यां पेटाँ करवता ऐण।
कल णआ परतां पल हरि मग जोवाँ भयाँ छमासी रैण।
थें बिछड़्याँ म्हाँ कलपाँ प्रभुजी, म्हारो गयो सब चैण।
मीराँ रे प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुक दैण।।

 थें मत बरजां माइड़ी

थें मत बरजां माइड़ी, साधां दरसण जावां।
स्याम रूप हिरदां बसां, म्हारे, ओर न भावां।
सब सोवां सुख नींदड़ी म्हारे नैण जगावां।
ग्याण नसां जग बाबरा ज्याकुं स्याम णा भावां।
मा हिरदां बस्या सांबरो म्हारे णींद न आवां।
चौमास्यां री बावड़ी, ज्यां कूं नीर णा पीवां।
हरि निर्झर अमृत झर्या म्हारी प्यास बुझावां।
रूप सुरंगा सांवरो, मुख निरखण जावां।
मीरां व्याकुल विरहणी, अपनी कर ल्यावां।।

थें तो पलक उघाड़ो दीनानाथ

थें तो पलक उघाड़ो दीनानाथ,
मैं हाजिर नाजिर कबकी खड़ी।।टेक।।
साजनियाँ दुसमण होय बैठ्या सबने लगूँ कड़ी।
तुम बिन साजन कोई नहीं है डिगी नाग समंद अड़ी।
दिन नहिं चैण रैण नहिं, निदरा, सूखूँ खड़ी-खड़ी।
बाण बिरह का लाग्या हिये में, भूलूँ न एक घड़ी।
पत्थर की तो अहिल्या तारी, बन के बीच पड़ी।
कहा बोझ मीराँ में कहिये, सौ पर एक धड़ी।।

थाँणो काँई काँई बोल सुणावा

थाँणो काँई काँई बोल सुणावा म्हाँरा साँवरां गिरधारी।।टेक।।
पूरब जणम री प्रीत पुराणी, जावा णा गिरधारी।
सुन्दर बदन जोवताँ साजण, थारी छबि बलहारी।
म्हाँरे आँगण स्याम पधारो, मंगल गावाँ नारी।
मोती चौक पुरावाँ ऐणाँ, तण म डारां बारी।
चरण सरण री दासी मीरां, जणम जणम री क्वाँरी।।

थारो रूप देख्याँ अटकी

थारो रूप देख्याँ अटकी।।टेक।।
कुल कुटम्ब सजण सकलस बार बार हटकी।
बिसर्यां णा लगण लगां मोर मुगट नटकी।
म्हाँरो मण मगण स्याम लोक कह्याँ भटकी।
मीराँ प्रभु सरण गह्याँ जाण्या घट घट की।।

तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे, नागर नंद कुमार

तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे, नागर नंद कुमार।
मुरली तेरी मन हर्यो, बिसर्यो घर-व्यौहार॥
जब तें सवननि धुनि परि, घर आँगण न सुहाइ।
पारधि ज्यूँ चूकै नहीं, मृगी बेधी दइ आइ॥
पानी पीर न जानई ज्यों मीन तड़फि मरि जाइ।
रसिक मधुप के मरम को नहिं समुझत कमल सुभाइ॥
दीपक को जो दया नहिं, उड़ि-उड़ि मरत पतंग।
‘मीरा’ प्रभु गिरिधर मिले, जैसे पाणी मिलि गयो रंग॥

तोती मैना राधे कृष्ण बोल

तोती मैना राधे कृष्ण बोल। तोती मैना राधे कृष्ण बोल॥टेक॥
येकही तोती धुंडत आई। लकट किया अनी मोल॥१॥
दाना खावे तोती पानी पीवे। पिंजरमें करत कल्लोळ॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। हरिके चरण चित डोल॥३॥

तेरो कोई नहिं रोकणहार, मगन होइ मीरा चली

तेरो कोई नहिं रोकणहार, मगन होइ मीरा चली।।
लाज सरम कुल की मरजादा, सिरसै दूर करी।
मान-अपमान दोऊ धर पटके, निकसी ग्यान गली।।
ऊँची अटरिया लाल किंवड़िया, निरगुण-सेज बिछी।
पंचरंगी झालर सुभ सोहै, फूलन फूल कली।
बाजूबंद कडूला सोहै, सिंदूर मांग भरी।
सुमिरण थाल हाथ में लीन्हों, सौभा अधिक खरी।।
सेज सुखमणा मीरा सौहै, सुभ है आज घरी।
तुम जाओ राणा घर अपणे, मेरी थांरी नांहि सरी।।

तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी

तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी॥
भवसागर में बही जात हौं, काढ़ो तो थारी मरजी।
इण संसार सगो नहिं कोई, सांचा सगा रघुबरजी॥
मात पिता औ कुटुम कबीलो सब मतलब के गरजी।
मीरा की प्रभु अरजी सुण लो चरण लगाओ थारी मरजी॥

तुम बिन मेरी कौन खबर ले

तुम बिन मेरी कौन खबर ले, गोवर्धन गिरिधारीरे॥टेक॥
मोर मुगुट पीतांबर सोभे। कुंडलकी छबी न्यारीरे॥१॥
भरी सभामों द्रौपदी ठारी। राखो लाज हमारी रे॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल बलहारीरे॥३॥

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