पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 15

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 15

नही जाऊंरे जमुना पाणीडा

नही जाऊंरे जमुना पाणीडा, मार्गमां नंदलाल मळे॥टेक॥
नंदजीनो बालो आन न माने। कामण गारो जोई चितडूं चळे॥१॥
अमे आहिउडां सघळीं सुवाळां। कठण कठण कानुडो मळ्यो॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। गोपीने कानुडो लाग्यो नळ्यो॥३॥

नहिं एसो जनम बारंबार

नहिं एसो जनम बारंबार॥
का जानूं कछु पुन्य प्रगटे मानुसा-अवतार।
बढ़त छिन-छिन घटत पल-पल जात न लागे बार॥
बिरछ के ज्यूं पात टूटे, लगें नहीं पुनि डार।
भौसागर अति जोर कहिये अनंत ऊंड़ी धार॥
रामनाम का बांध बेड़ा उतर परले पार।
ज्ञान चोसर मंडा चोहटे सुरत पासा सार॥
साधु संत महंत ग्यानी करत चलत पुकार।
दासि मीरा लाल गिरधर जीवणा दिन च्यार॥

नंदननंदन मण भायां णभ छायां

नंदननंदन मण भायां णभ छायां।।टेक।।
इत घन गरजां उत घन लरजां, चमकां बिज्जु डरायां।
उमड़ घुमड घण छायां, पवण चल्यां पुरवायां।
दादुर मोर पपीहा बोलां, कोयल सबद सुणायां।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, चरण केवल चितलायां।।

धूतारा जोगी एकरसूँ हँसि बोल

धूतारा जोगी एकरसूँ हँसि बोल।।टेक।।
जगत बदीत करी मनमोहन, कहा बजावत ढोल।
अंग भभूति गले मृगछाला, तू जन गुढ़िया खोल।
सदन सरोज बदन की सोभा, ऊभी जोऊँ कपोल।
सेली नाद बभूत न बटवो, अजूँ मुनी मुख खोल।
चढ़ती बैस नैण अणियाले, तूं धरि धरि मत डोल।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चेरी भई बिन मोल।।

देखाँ माई हरि, मण काठ कियाँ

देखाँ माई हरि, मण काठ कियाँ ।।टेक।।
आवण कह गयाँ अजाँ ण आया, कर म्हाणे कोल गयाँ।
खान पान सुध बुध सब बिसरयाँ, काइ म्हारो प्राण जियाँ।
यारो कोल विरूद्ध जग यारो, थे काँई बिसर गयां।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, थें बिण फटा हियां।।

देखत राम हंसे सुदामाकूं देखत राम हंसे

देखत राम हंसे सुदामा कूं देखत राम हंसे॥

फाटी तो फूलडियां पांव उभाणे चरण घसे।
बालपणेका मिंत सुदामां अब क्यूं दूर बसे॥

कहा भावजने भेंट पठाई तांदुल तीन पसे।
कित गई प्रभु मोरी टूटी टपरिया हीरा मोती लाल कसे॥

कित गई प्रभु मोरी गउअन बछिया द्वारा बिच हसती फसे।
मीराके प्रभु हरि अबिनासी सरणे तोरे बसे॥

पाठांतर
देखत राम हँसे सुदामाँ कूँ, देखत राम हँसे।।टेक।।
फाटयी तो फूलड़ियाँ पाँव उभाणे, चलतै चरण घसे।
बाँलपणे का मिंत सुदामा, अब क्यूँ दूर बसे।
कहाँ भावजने भेट पठाई, तान्दुल तीन पसे।
कित गई प्रभु मोरी टूट टपरिया, हीरा, मोतीलाल कसे।
कित गी प्रभु मोरी गउवन बछिया द्वारा बिच हँसती फसे।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, सरणे तोरे बसे।।

दरस म्हारे बेगि दीज्यो जी

दरस म्हारे बेगि दीज्यो जी
ओ जी अन्तरजामी ओ राम खबर म्हारी बेगि लीज्यो जी
आप बिन मोहे कल ना पडत है जी
ओजी तडपत हूं दिन रैन रैन में नीर ढले है जी
गुण तो प्रभुजी मों में एक नहीं छै जी
ओ जी अवगुण भरे हैं अनेक अवगुण म्हारां माफ करीज्यो जी
भगत बछल प्रभु बिड़द कहाये जी
ओ जी भगतन के प्रतिपाल सहाय आज म्हांरी बेगि करीज्यो जी
दासी मीरा की विनती छै जी
ओजी आदि अन्त की ओ लाज आज म्हारी राख लीज्यो जी

तुम्हरे कारण सब छोड्या

तुम्हरे कारण सब छोड्या, अब मोहि क्यूं तरसावौ हौ।
बिरह-बिथा लागी उर अंतर, सो तुम आय बुझावौ हो॥
अब छोड़त नहिं बड़ै प्रभुजी, हंसकर तुरत बुलावौ हौ।
मीरा दासी जनम जनम की, अंग से अंग लगावौ हौ॥

पाठांतर
तुमर कारण सब सुख छाँड्यां, अब मोही क्यूं तरसावो हो।।टेक।।
बिरह बिथा लागी उर अन्तर, सो तुम आन बुझावो हो।
अब छोड़त नाहिं बणै प्रभु जी, हँसि करि तुरन्त बुलावौ हो।
मीराँ दासी जनम जनम की अँग से अँग लगावौ हो।।

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