पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 14

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 14

नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय

नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय ।।टेक।।
रोम रोम नख सिख सब निरखत, ललकि रहै ललचाय।
मैं ठाढी गृह आपणे सै, मोहन निकसे आय।।
बदन चन्द परकातत हेली, मन्द मनद मुसकाय।
लोग कुटुम्बी बरजि बरजहीं, मानस पर हाथ गये बिकाय।
भली कहो कोई बुरी कहो, मैं सब लई सीस चढ़ाय।
मीराँ प्रभु गिरधर लाल बिनु, पल भर रह्यौ न जाय।।

नैना निपट बंकट छबि अटके

नैना निपट बंकट छबि अटके।
देखत रूप मदनमोहन को, पियत पियूख न मटके।
बारिज भवाँ अलक टेढी मनौ, अति सुगंध रस अटके॥
टेढी कटि, टेढी कर मुरली, टेढी पाग लट लटके।
‘मीरा प्रभु के रूप लुभानी, गिरिधर नागर नट के॥

पाठांतर
म्हारे णेणा निपट बंकट छब अँटके।।टेक।।
देख्‌आंय रूप मदन मोहन री, पियत पियूख न मटके।
बारिज भवाँ अलक मँतवारी, णैण रूप रस अँटके।
टेढ्याँ कट टेढ़े करि मुरली, टेढ्याँ पाग लर लटके।
मीराँ प्रभु रे रूप लुभाणी, गिरधरनागर नट के।।

नींद नहीं आवे जी सारी रात

नींद नहीं आवे जी सारी रात ।।टेक।।
करवट लेकर रोज टटोलूँ, पिया नहीं मेरे साथ।
सगरी रैन मोहै तरफत बीती, सोच सोच जिय जात।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर आज भयो परभात।।

नाव किनारे लगाव प्रभुजी

नाव किनारे लगाव प्रभुजी नाव किनारे लगाव॥टेक॥
नदीया घहेरी नाव पुरानी। डुबत जहाज तराव॥१॥
ग्यान ध्यानकी सांगड बांधी। दवरे दवरे आव॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। पकरो उनके पाव॥३॥

नाथ तुम जानतहो सब घटकी

नाथ तुम जानतहो सब घटकी, मीरा भक्ति करे प्रगटकी॥टेक॥
ध्यान धरी प्रभु मीरा संभारे पूजा करे अट पटकी।
शालिग्रामकूं चंदन चढत है भाल तिलक बिच बिंदकी॥१॥
राम मंदिरमें नाचे ताल बजावे चपटी।
पाऊमें नेपुर रुमझुम बाजे। लाज संभार गुंगटकी॥२॥
झेर कटोरा राणाजिये भेज्या संत संगत मीरा अटकी।
ले चरणामृत मिराये पिधुं होगइे अमृत बटकी॥३॥
सुरत डोरी पर मीरा नाचे शिरपें घडा उपर मटकी।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर सुरति लगी जै श्रीनटकी॥४॥

नागर नंदकुमार, लाग्यो थारो नेह

नागर नंदकुमार, लाग्यो थारो नेह।।टेक।।
मुरली धुण सुण बीसराँ म्हारो, कुणवो गेह।
पाणी पीर णा जाणई, मीण तलफि तज्यां देह।
दीपक जाण्या पीर णा पतंग जल्या जल खेह।
मीराँ रे प्रभु सांवरे रेष थें बिण देह अदेह।।

तनक हरि चितवौ जी मोरी ओर

तनक हरि चितवौ जी मोरी ओर।
हम चितवत तुम चितवत नाहीं
मन के बड़े कठोर।
मेरे आसा चितनि तुम्हरी
और न दूजी ठौर।
तुमसे हमकूँ एक हो जी
हम-सी लाख करोर।।
कब की ठाड़ी अरज करत हूँ
अरज करत भै भोर।
मीरा के प्रभु हरि अबिनासी
देस्यूँ प्राण अकोर।।

पाठांतर
तनक हरि चितवाँ म्हारी ओर ।।टेक।।
हम चितबाँ थें चितवो णा हरि, हिबड़ो बड़ो कठोर।
म्हारी आसा चितवनि यारी, ओर णा दूजा दोर।
ऊभ्याँ ठाड़ी अरज करूँ छूँ, करताँ करताँ भोर।
मीराँ रे प्रभु हरि अबिनासी, देस्यूँ प्राण अँकोर।।

Leave a Reply