पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 12

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 12

चालो अगमके देस कास देखत डरै

चालो अगमके देस कास देखत डरै।
वहां भरा प्रेम का हौज हंस केल्यां करै॥
ओढ़ण लज्जा चीर धीरज कों घांघरो।
छिमता कांकण हाथ सुमत को मूंदरो॥
दिल दुलड़ी दरियाव सांचको दोवड़ो।
उबटण गुरुको ग्यान ध्यान को धोवणो॥
कान अखोटा ग्यान जुगतको झोंटणो।
बेसर हरिको नाम चूड़ो चित ऊजणो॥
पूंची है बिसवास काजल है धरमकी।
दातां इम्रत रेख दयाको बोलणो॥
जौहर सील संतोष निरतको घूंघरो।
बिंदली गज और हार तिलक हरि-प्रेम रो॥
सज सोला सिणगार पहरि सोने राखड़ीं।
सांवलियांसूं प्रीति औरासूं आखड़ी॥
पतिबरता की सेज प्रभुजी पधारिया।
गावै मीराबाई दासि कर राखिया॥

पाठांतर
चालाँ अगमवा देस काल देख्याँ डराँ।
भरो प्रेम रा होज हंस केल्याँ कराँ।
साधा सन्त रो संग, ग्याण जुगताँ कराँ।
धराँ सांवरो ध्यान चित्त उजलो कराँ।
सील घूँघरां बाँध तोस निरता कराँ।

छोडो चुनरया छोडो मनमोहन

छोडो चुनरया छोडो मनमोहन मनमों बिच्यारो॥टेक॥
नंदाजीके लाल। संग चले गोपाल धेनु चरत चपल।
बीन बाजे रसाल। बंद छोडो॥१॥
काना मागत है दान। गोपी भये रानोरान।
सुनो उनका ग्यान। घबरगया उनका प्रान।
चिर छोडो॥२॥
मीरा कहे मुरारी। लाज रखो मेरी।
पग लागो तोरी। अब तुम बिहारी।
चिर छोडो॥३॥

जमुनामों कैशी जाऊं मोरे सैया

जमुनामों कैशी जाऊं मोरे सैया। बीच खडा तोरो लाल कन्हैया॥टेक॥
ब्रिदाबनके मथुरा नगरी पाणी भरणा। कैशी जाऊं मोरे सैंया॥१॥
हातमों मोरे चूडा भरा है। कंगण लेहेरा देत मोरे सैया॥२॥
दधी मेरा खाया मटकी फोरी। अब कैशी बुरी बात बोलु मोरे सैया॥३॥
शिरपर घडा घडेपर झारी। पतली कमर लचकया सैया॥४॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलजाऊ मोरे सैया॥५॥

जागो बंसी वारे जागो मोरे ललन

जागो बंसी वारे जागो मोरे ललन।
रजनी बीती भोर भयो है घर घर खुले किवारे।
गोपी दही मथत सुनियत है कंगना के झनकारे।
उठो लालजी भोर भयो है सुर नर ठाढ़े द्वारे ।
ग्वाल बाल सब करत कोलाहल जय जय सबद उचारे ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर शरण आयाँ कूं तारे ॥

पाठांतर
जागो बंसीवारे ललना, जागो मोरे प्यारे।।टेक।।
रजनी बीती भोर भयो है, घर घर खूले किंवारे।
गोपी दही मथत सुनियत है, कँगना के झनकारे।
उछो लाल जी भोर भयो है, सुन रन ठाढ़े द्वारे।
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल, जय जय सबद उचारे।
माखन रोटी हाथ में लीनी, गउधन के रखवारे।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, सरण आयाँ कूँ तारे।।

जावादे जावादे जोगी किसका मीत

जावादे जावादे जोगी किसका मीत।।टेक।।
सदा उदासी रहै मोरि सजनी, निपट अटपटी रीत।
बोलत वचन मधुर से मानूँ, जोरत नाहीं प्रीत।
मैं जाणूं या पार निभैगी, छांड़ि चले अधबीच।
मीरां के प्रभु स्याम मनोहर प्रेम पियारा मीत।।

जोगिया से प्रीति कियां दुख, होई

जोगिया से प्रीति कियां दुख, होई।।टेक।।
प्रीत कियां सुख ना मोरी सजनी, जोगी मित न कोइ।
रात दिवस कल नाहिं परत है, तुम मिलियां बिनि मोइ।
ऐसी सूरत या जग माहीं फेरि न देखी सोइ।
मीरां रे प्रभु कबरे मिलोगे, मिलियां आणद होइ।।

जोगी मेरो सांवळा कांहीं गवोरी

जोगी मेरो सांवळा कांहीं गवोरी॥टेक॥
न जानु हार गवो न जानु पार गवो। न जानुं जमुनामें डुब गवोरी॥१॥
ईत गोकुल उत मथुरानगरी। बीच जमुनामो बही गवोरी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल चित्त हार गवोरी॥३॥

झटक्यो मेरो चीर मुरारी

झटक्यो मेरो चीर मुरारी।।टेक।।
गागर रां सिरते झटकी, बेसर मुर गई सारी।
छुटी अलक कुण्डल तें उरझी, झड़ गई कोर किनारी।
मनमोहन रसिक नागर भये, हो अनोखे खिलारी।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर चरण कमल सिरधारी।।

णेणाँ लोभाँ अटकां शवयाँणा फिर आय

णेणाँ लोभाँ अटकां शवयाँणा फिर आय।।टेक।।
रूँम रूँम नखशिख लख्याँ, ललक ललक अकुलाय।
म्हाँ ठाढ़ी घर आपणै, मोहन निकल्याँ आय।
बदन चन्द परगासताँ, मन्द मन्द मुसकाय।
सकल कुटम्बां बरजतां, बोल्या बोल बनाय।
णेणा चञ्चल, अटक णा माण्या, परहथ गयाँ बिकाय।
भलो कह्याँ कांई कह्याँ बुरोरी सब लया सीस चढ़ाय।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर बिण पर रह्याँ णा जाय।।

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