पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 11

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 11

चालां पण या जमणा कां तीर

चालां पण या जमणा कां तीर।।टेक।।
वा जमणा का निरमल पाणी, सीतल होयां सरीर।
बँसी बजावां गावां कान्हां, संग लियां बलवीर।
मीर मुगट पीताम्बर सोहां, कुण्डल झलकणा हीर।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, क्रीड्या संग बलवीर।।

जब ते मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पड्यो माई

जब ते मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पड्यो माई।
तब से परलोक लोक कछु न सुहाई।
मोहन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहै।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै।।
कुण्डल की अलक झलक कपोलन पर छाई।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई।।
कुटिल तिलक भाल चितवन में टोना।
खजन अरू मधुप मीन भूले मृग छोना।।
सुन्दर अति नासिका सुग्रीव तीन रेखा।
नटवर प्रभु वेष धरे रूप अति बिसेखा।।
अधर बिम्ब अरूण नैन मधुर मन्द हाँसी।
दसन दमक दाड़ि द्युति अति चपला सी।।
छुद्र घण्टिका किंकनि अनूप धुन सुहाई।
गिरधर के अंग-अंग मीरा बलि जाई।।

जशोदा मैया मै नही दधी खायो

जशोदा मैया मै नही दधी खायो॥टेक॥
प्रात समये गौबनके पांछे। मधुबन मोहे पठायो॥१॥
सारे दिन बन्सी बन भटके। तोरे आगे आयो॥२॥
ले ले अपनी लकुटी कमलिया। बहुतही नाच नचायो॥३॥
तुम तो धोठा पावनको छोटा। ये बीज कैसो पायो॥४॥
ग्वाल बाल सब द्वारे ठाडे है। माखन मुख लपटायो॥५॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। जशोमती कंठ लगायो॥६॥

जाण्याँ णा प्रभु मिलण बिध क्यां होय

जाण्याँ णा प्रभु मिलण बिध क्यां होय।।टेक।।
आया म्हारे आगणाँ फिर में जाण्या खोय।
जोवताँ मग रैण बीनां दिवस बीताँ जोय।
हरि पधाराँ आगणां गया में अभागण सोय।
बिरह व्याकुल अनल अन्तर कल णा पड़ता दोय।
दासी मीराँ लाल गिरधर मिल णा बिछडयाँ कोय।।

जोगिया ने कहज्यो जी आदेस

जोगिया ने कहज्यो जी आदेस।।टेक।।
जोगियो चतुर सुजाण सजनी, ध्यावै संकर सेस।
आऊंगी में नाह रहूँगी (रे म्हारा) पीव बिना परदेस।
करि करिपा प्रतिपाल मो परि, रखो न आपण देस।
माला मुदरा मेखला रे बाला, खप्पर लूँगी हाथ।
जोगिण होई जुग ढूँढसूँ रे, म्हाँरा रावलियारी साथ।
सावण आबण कह गया बाला, कर गया कौल अनेक।
गिणता-गिणता घँस गई रे, म्हाँरा आँगलिया रेख।
पीव कारण पीली पड़ी बाला, जोबन बाली बेस।
दास मीराँ राम भजि कै, तन मन कीन्हीं पेस।।

जो तुम तोड़ो पियो मैं नही तोड़ूँ

जो तुम तोड़ो पियो मैं नही तोड़ूँ।
तोरी प्रीत तोड़ी कृष्ण कोन संग जोड़ूँ ॥
तुम भये तरुवर मैं भई पखिया।
तुम भये सरोवर मैं तोरी मछिया॥
तुम भये गिरिवर मैं भई चारा।
तुम भये चंद्रा हम भये चकोरा॥
तुम भये मोती प्रभु हम भये धागा।
तुम भये सोना हम भये स्वागा॥
बाई मीरा कहे प्रभु ब्रजके बाशी।
तुम मेरे ठाकोर मैं तेरी दासी॥

डारी गयो मनमोहन पासी

डारी गयो मनमोहन पासी।।टेक।।
आँबाँ की डालि कोइल इक बोलै, मेरो मरण अरू जग केरी हाँसी।
विरह की मारी मै बन बन डोलूँ, प्रान तजूँ करवत ल्यूँ कासी।
मीराँ रे प्रभु हरि अबिनासी, तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी।।

पाठांतर
डर गयोरी मन मोहनपास, डर गयोरी मन मोहनपास॥१॥
बीरहा दुबारा मैं तो बन बन दौरी। प्राण त्यजुगी करवत लेवगी काशी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। हरिचरणकी दासी॥३॥

 

 

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