पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 10

पदावली-मीरा बाई -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Meera Bai part 10

चरन रज महिमा मैं जानी

चरन रज महिमा मैं जानी।

याहि चरनसे गंगा प्रगटी।
भगिरथ कुल तारी॥१॥
याहि चरनसे बिप्र सुदामा।
हरि कंचन धाम दिन्ही॥२॥
याहि चरनसे अहिल्या उधारी।
गौतम घरकी पट्टरानी॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर।
चरनकमल से लटपटानी॥४॥

छोड़ मत जाज्यो जी महाराज

छोड़ मत जाज्यो जी महाराज॥
मैं अबला बल नायं गुसाईं, तुमही मेरे सिरताज।
मैं गुणहीन गुण नांय गुसाईं, तुम समरथ महाराज॥
थांरी होयके किणरे जाऊं, तुमही हिबडारो साज।
मीरा के प्रभु और न कोई राखो अबके लाज॥

पाठांतर
छोड़ मत जाज्यो जी महाराज ।।टेक।।
म्हा अबला बल म्हारो गिरधर, थें म्हारो सरताज।
म्हा गुणहीन गुणागार नागर, म्हा हिवड़ो रो साज।
जग तारण भोभीत निवारण, थें राख्यां गजराज।
हार्यां जीवन सरण रावलां, कठे जावां ब्रजराज।
मीरां रे प्रभु और णा कोई, राखा अब री लाज।।

जोगिया जी आज्यो जी इण देस

जोगिया जी आज्यो जी इण देस।।टेक।।
नैणज देखूँ नाथ नै धाइ करूँ आदेस।
आया सावण भादवा भरीया जल थल ताल।
रावल कुण बिलमाई राखो, बिरहनि है बेहाल।
बरस्या बौहो दिन भया बल बरस्यौ पलक न जाई।
एक बेरी देह फेरी, नगर हमारे आइ।
वा मूरति म्हारे मन बसे छिन भरि रह्योइ न जाइ।
मीराँ के कोयई नाहिं दूजो, दरसण दीज्यौं आइ।।

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