पता हो तो बताना-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

पता हो तो बताना-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

वो कविता कहाँ गई
जो तुमने लिखी थी कभी।
ये तो वो है जो छपी है
इसमें से जो तुमने काटा
वही तो कविता थी कवि साहब!
वो कहाँ गई।

ताजा चुए दूध सी थी वो
मक्खन के कणों वाली
पहाड़ी गायों के दूध घी जैसी
ये तो सिर्फ कच्ची लस्सी सी है जनाब
कविता किधर गई।

ये तो टाल पर पड़ी कटी-छाँगी
टहनियों की गठरी है
निरा जलावन सरकार
खाट, पिड़े, कुर्सियाँ-मेज
इससे नहीं बनते।
ये तो असल वृक्ष की छाँव थी
अब वृक्ष कहाँ है?
अकेला कर आए हो तने की जात
कितनी ज़ालिम है तेरी औकात
कवि बना फिरता है।
जा कविता ढूँढ कर ला
जिसमें सपने थे चिंगारियाँ छोड़ते
छोटे-छोटे अनेकों सूरज
अलग-अलग पृथ्वियाँ रौशनाते

तुमने तो दरियों की तरह तहकर
संभाल दिए हैं संदूक में पाँचो दरिया।
ये क्या किया?
धरती कौन सींचेगा?
शब्दों की आँख नम हो जाती
तेरी कविता पढ़ते हुए।
ये तो गुड़ की भेली का चूरा है
पूरी भेली कहाँ गई?
कूट-कूट चूरा करते तुमने
मेरे भेली बनाते
बापू के हाथों के निशान!
बुलडोजर चला दिया है
अपनी सड़क सपाट बनाते
मिटा दिए हैं पगडंडियों के
पैरों पर रचे राह।

अपनी कविता सीधी करते।
अब मुझे अपने गाँव, घर और
खेत का राह भूल गया है।
मीलों मील ज्यादा चलना पड़ता है
तेरे बनाए आठमार्गी विकास के कारण।
मुझे क्या करना था
फ्लाईओवरों के जाल का
जिस पर बैलगाड़ी नहीं चढ़ती?
चारे के गट्ठरों के लिए खेत
दूर हो गए हैं मीलों।
नानी के घर से दूर हो गया दादी का घर।

तुम्हारी कविता से
ये सारा कुछ किधर गया?
कौन ले गया तेरा ईमान
शब्द विधान या कोई और बेईमान?
तुमसे उम्मीद नहीं थी
शब्दों से दर्द खींच लोगे?
आँसू बिना अंधी अँक्खियाँ
तुम्हारी कविता सी संवेदनहीन।

तुम किताबें लिखते जाओ!
हम वक़्त के पन्ने से पढ़ लेंगे
पीड़ाओं के दस्तावेज।
तुमने ही तो संभालने थे
रुदन के वार्तालाप
अंबर चीरती धरती की हूक।
सुब्कियों की इबारत लिखनी थी।

वो तो तुमने कविता सुधारते
वैसे ही सुधार दिया
जैसे पुलिस की लाठियाँ
सुधारती थीं बोलता पंजाब
जयकारे, नारे लगाता
बकरे बनाता
बिगड़ैल सपनों का बे-लगाम काफिला।
तुम्हारी कविता में
वो अंगारे कहाँ हैं?
जो गर्मी पहुँचाते राह रौशनाते
अब तो गर्म राख का फेर है
तुम्हारी रेशमी पन्नों वाली किताब।
खद्दर की भाषा में कौन लिखेगा?
जुलाहों का दर्द
कौन गाँठेगा मोची की फटी आहें?
दर्ज़ी की मशीन खा गए कॉरपोरेट
दुकानों को उजाड़ गए मॉल
भट्ठियाँ नहीं छुपा पाई दाने पैकेटों में
थैलीशाहों के कारिंदे बन गए।
ग्वार-पट्ठा ऐलोवेरा बन
जा बैठा मुनाफे के डिब्बों में
नरमा पड़ा है मंडी में
सूत अकड़ता है बाजार में
कौन है जो फ़ासले बढ़ा गया
तुम्हारे और कविता के बीच।
बाजार? सरकार? व्यापार? या
विश्व-मंडी का जग डसता संसार?
पता हो तो बताना?

 

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