पता रखा करो-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

पता रखा करो-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

सूरज किधर से उगता है,
किधर डूबता है, पता रखा करो।
रंग की डिब्बियाँ लेकर
सिर्फ़ महलों की दीवारें ही पोतता,
बड़े घरों के आँगन में,
सुर्ख़, पीले, नीले और दूसरे
रंगों के गुलाब खिलाता है।
कच्चे घरों झोपड़ियों का मुँह चिढ़ाता है।
कभी हमारे, आँगन में पैर क्यों नहीं रखता।

तीखी दोपहर, तांबे-सा तपता है जिस्म।
सूखता है भीतर, बचा हुआ थोड़ा बहुत रक्त।
पसीना पोछते मारी जाती है मति।
तेज़ तर्रार किरणें मज़ाक करतीं।
आशाएँ उम्मीदें तड़प तड़प मरतीं।
सिकुड़ जाता है वजूद जब आती सर्दियाँ
नंग धड़ंगों पर क्या बीतती है।

ए,बी,सी, खा चुकी है
शिखर दुपहरे ‘ऊडे़’ पर के जूड़े
पाठशाला की छतों को
उड़ा कर ले चला है टाई वाला तूफ़ान।
जुगाली करता चिंगम-ज्ञान
अस्पतालों से इलाज़ नहीं
मृत्यु प्रमाण पत्र मिलते हैं।

कौन ले गया हमारे नयन प्राण
गीत संगीत में खटास कौन घोलता।
सुरों को सुअरों की तरह कौन रौंदता
शब्द-संस्कृति में से आचार।
ज़िंदगी के हर हिस्से में से किरदार।
साझे जीवन-मरण का व्यवहार।
किस अज़गर की फूक से
ख़ाक हुआ?

फुलकारियों* को फाड़ कर
चढ़ते जाड़े में पशुओं हेतु ओढ़ना बनने वाला है।

ब्याह शादी के मंडप,
बारात की रंग बिरंगी दस्तरें,
परेड जैसी होंगी।
बहुत हो गया रंग रंग खेलना।

काश्मीर से कन्याकुमारी तक
अब पता लगेगा कि भारत एक है।
जीभ को अब पता लगेगा कि
बत्तीस दाँतों के बीच कैसे रहते हैं।
बहुत हो गया मन मर्ज़ी का नाच।
हमारा ही लिखा पढ़ना पड़ेगा।
सिलेबस बदल गया है।

लाल किले की फ़सील से
अहंकार सिर चढ़ कर क्यों बोलता है।
साबित कदमों का ईमान क्यों डोलता है।

भूल जाओ कि मुल्क सिर्फ़ जमैटरी बक्स में से
निकाले परकार का खींचा नक़्शा ही होता है।
बदल सकती हैं ग्लोब की फाँकियाँ।
मुल्क में और बहुत कुछ होता है।
जैसे फूलों में रंग और महक
अनार के दानों में रस।

जीव जंतु में भरोसा विश्वास
हदों सरहदों में रह कर भी
व्यवहृत न करने का विस्तार
कब और क्यों जंग में बदलता है।

धीमी रफ़्तार में धड़कता दिल
छलनी फेफड़ों में जमा गर्द गुबार
गुर्दों में जमा हुआ कचरा और
और बहुत कुछ ऐसा होता
यदि कोई तुम्हें
त्वचा रोग के वैद्य की ओर भेजता है
तो उसकी आँख के टेढ़ेपन को पहचानो
राह से कुराह पर क्यों डालता है
मौसम विशेषज्ञों से पूछो तो सही
समुद्र की तरह ज्वार भाटा
कब आएगा हमारे मनो में
कब लगेगा आशाओं के वृक्ष में बौर
कुछ तो बताओ हुज़ूर
सूत कातती मक्के की बालियाँ
धान की मंजरियाँ
गेहूँ की बालियाँ
कब तक साहूकार के बही की
गुलामी काटेंगी
बही खाते के पन्नों से
हमारा नाम कब मिटेगा?
पता रखा करो
कितने काल तक और?

 

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