पतझड़-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

पतझड़-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

 

इस बार फिर हवा से सरकते सूखे पत्तों ने
सिसकते हुए कहा-
‘क्या तुम भी बदल गयी हो

बदलते हुए मौसम की तरह ?
आज भी तुम्हारा वह हमराही
जो वर्षों से है प्रतीक्षित
रोज आकर उसी पेड़ की टेक लेकर
घंटों शून्य में अपनी पथराई आँखों से
तुम्हें तलशता है ।
जहाँ तुम लोग अक्सर बैठा करते थे’
मैं भी क्या कहती ?
अब तक भी क्या अलग हो सकी हूँ उससे ?
फर्क बस इतना है कि
अब हमारे रास्ते नदी के वो दो किनारे हैं
जो साथ-साथ चलते हैं पर मिलते नहीं
पर मेरी साँसों में उसकी तपिश को
हर पल महसूस करती हूँ
कितनी बार नाकाम कोशिश भी की है
भुलाने की
पर हर बार चुपके से उसके नाम को जाकर देखा है
उसी पेड़ पर जो मैंने लिखा था कभी
आज भी अक्सर अनचाहे में
उसका नाम गीली रेत पर लिख दिया करती हूँ
हमेशा लहरें बहा ले जाया करती हैं
अब इतनी हिम्मत भी शेष नहीं कि
जाकर उसे समझा सकूँ
दूर रहकर भी उसकी कुशलता की कामना
मैंने हमेशा की है
और मेरा क्या ? जी भरकर रोना तो दूर
सिसक भी नहीं सकती
खुद को दीवारों में समेटे
मुँह पर ताले लगा लिए हैं
मेरी आँखों ने उसकी आँखों से जो देखे
उन सपनों की भी पहरेदारी जो है

अब तो, कभी नहाते तो कभी प्याज काटते
और कभी धूल भरी आँधियों में
मुक्त कर देती हूँ अवरोधित अश्रु-धारा को
कुछ पल के लिए ही सही
मन हल्का हो जाता है ।

 

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