पडीआ कवन कुमति तुम लागे-शब्द-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji

पडीआ कवन कुमति तुम लागे-शब्द-कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji

पडीआ कवन कुमति तुम लागे ॥
बूडहुगे परवार सकल सिउ रामु न जपहु अभागे ॥१॥ रहाउ ॥
बेद पुरान पड़े का किआ गुनु खर चंदन जस भारा ॥
राम नाम की गति नही जानी कैसे उतरसि पारा ॥१॥
जीअ बधहु सु धरमु करि थापहु अधरमु कहहु कत भाई ॥
आपस कउ मुनिवर करि थापहु का कउ कहहु कसाई ॥२॥
मन के अंधे आपि न बूझहु काहि बुझावहु भाई ॥
माइआ कारन बिदिआ बेचहु जनमु अबिरथा जाई ॥३॥
नारद बचन बिआसु कहत है सुक कउ पूछहु जाई ॥
कहि कबीर रामै रमि छूटहु नाहि त बूडे भाई ॥४॥१॥1102॥

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