पक्षिकाशी-कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kuppali Venkatappa Puttappa

पक्षिकाशी-कुपल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kuppali Venkatappa Puttappa

 

यहाँ है नहीं तेरा प्रवेश, हे व्याध;
यह है पक्षिकाशी।
देवनदी में, ईश कृपा में
भावतरुवासी
प्राणपक्षी संकुल को मिलता है संरक्षण यहाँ;
है यह नित्य अविनाशी
देख शक्ति को मिली है रक्षा यहाँ से।
अग्नि की जलराशि की।

मारनेवाले तीर, कमान, तरकस सबको
छोड़ वहीं, आ!
बसे सब अहंकार की, तिरछे तंत्रों की
सब कुछ छोड़ वहीं, आ।

नहाकर आ, हाथ धोकर आ,
अहंकार छोड़कर आ,
इक्षुमधुर-सी है मोक्षपक्षी की चहक
जब बहेगी रग-रग में
खुशी से झूम उठेगा, आ।

 

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