पंथी! तू क्यों घबराता है!-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

पंथी! तू क्यों घबराता है!-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

पंथी! तू क्यों घबराता है ?

जब तूने जग में खोले दृग,
ऊपर था नभ, नीचे था मग,
अब भी तेरे साथ-साथ यह नभ, पथ चलता जाता है!
पंथी! तू क्यों घबराता है ?

कैसे कहता एकाकी फिर,
उस पर तो किंचित डाल नज़र,
युग-युग से जो सूने मरु पर यह ताड़ खडा लहराता है!
पंथी! तू क्यों घबराता है ?

नव आशा से बढ़ता जा तू
जीवन-विष कटु पीता जा तू
वीरों के कंठों में जाकर विष भी तो मधु बन जाता है!
पंथी! तू क्यों घबराता है ?

Leave a Reply