पंच मजमी जो पंचन राखै-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

पंच मजमी जो पंचन राखै-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

पंच मजमी जो पंचन राखै ॥
मिथिआ रसना नित उठि भाखै ॥
चक्र बणाइ करै पाखंड ॥
झुरि झुरि पचै जैसे त्रिअ रंड ॥१॥
हरि के नाम बिना सभ झूठु ॥
बिनु गुर पूरे मुकति न पाईऐ साची दरगहि साकत मूठु ॥१॥ रहाउ ॥
सोई कुचीलु कुदरति नही जानै ॥
लीपिऐ थाइ न सुचि हरि मानै ॥
अंतरु मैला बाहरु नित धोवै ॥
साची दरगहि अपनी पति खोवै ॥२॥
माइआ कारणि करै उपाउ ॥
कबहि न घालै सीधा पाउ ॥
जिनि कीआ तिसु चीति न आणै ॥
कूड़ी कूड़ी मुखहु वखाणै ॥३॥
जिस नो करमु करे करतारु ॥
साधसंगि होइ तिसु बिउहारु ॥
हरि नाम भगति सिउ लागा रंगु ॥
कहु नानक तिसु जन नही भंगु ॥4॥40॥53॥1151॥

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