न बनने दो-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

न बनने दो-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

तुम लिखो हर बात चाहे जिस तरह चाहो
काव्य को पर वाद का कंगन न बनने दो।

आयु है जितनी समय की गीत की उतनी उमर है
चाँदनी जब से हँसी है रागिनी तब से मुखर है;
ज़िन्दगी जाता स्वयं है जान लें गाना अगर हम
हर सिसकती साँस लय है, हर छलकता अश्रु स्वर है,

गुनगुनाओ गीत तुम हर हाल में, लेकिन
तान को तलवार का चारण न बनने दो।

है वही साहित्य, जो बाँधे न हमको, किन्तु खोले,
हर सुखी के साथ हँस ले, हर दुखी के साथ रो ले;
चाँद का काजल छुड़ा दे, सूर्य को दर्पण दिखा दे,
आदमी से प्यार कर ले अश्रु से आँचल भिगो ले ।

तुम उठो, जाओ, मिलो हर भीड़-मेले से
पर मिलन को विरह का कारण न बनने दो ।

बदलियों से आँख जिसकी बूँद बनकर झर रही है,
चाँद बनकर जो सितारों से इशारे कर रही है,
व्योम को सिर पर उठाए, भूमि को पग से दबाए
इस तरफ जो उठ रही है, उस तरफ जो गिर रही है

वह सभी है ज़िन्दगी, उसको छुओ बढ़कर
पर सृजन को ध्वंस का साधन न बनने दो ।

यह अँधेरा, वह अँधेरा रोशनी को सब सहन है,
यह उजेरा, वह उजेरा धूप दोनों की बहन है;
यह दुआरा, वह दुआरा; यह हमारा, वह तुम्हारा-
कुछ नहीं है, सिर्फ भ्रम के एक परदे का पतन है ।

तुम चलो सारी दिशाएँ नापते जाओ,
पर प्रगति को अगति का आसन न बनने दो ।

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