न्यौता और चुनौती -शैलेन्द्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shailendra Part 3

न्यौता और चुनौती -शैलेन्द्र -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shailendra Part 3

उस दिन

उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी !

जिस दिन तुमने सरल स्नेह भर
मेरी ओर निहारा;
विहंस बहा दी तपते मरुथल में
चंचल रस धारा!
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी!

जिस दिन अरुण अधरों से
तुमने हरी व्यथाएं;
कर दीं प्रीत-गीत में परिणित
मेरी करुण कथाएं!
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी!

जिस दिन तुमने बाहों में भर
तन का ताप मिटाया;
प्राण कर दिए पुण्य–
सफल कर दी मिट्टी की काया!
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी!

(1945 में रचित)

क्यों प्यार किया

जिसने छूकर मन का सितार,
कर झंकृत अनुपम प्रीत-गीत,
ख़ुद तोड़ दिया हर एक तार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया ?

बरसा जीवन में ज्योतिधार,
जिसने बिखेर कर विविध रंग,
फिर ढाल दिया घन अंधकार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया ?

मन को देकर निधियां हज़ार,
फिर छीन लिया जिसने सब कुछ,
कर दिया हीन चिर निराधार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया ?

जिसने पहनाकर प्रेमहार,
बैठा मन के सिंहासन पर,
फिर स्वयं दिया सहसा उतार,
मैंने उससे क्यों प्यार किया ?

(1946 में रचित)

इतिहास

खेतों में, खलिहानों में,
मिल और कारखानों में,
चल-सागर की लहरों में
इस उपजाऊ धरती के
उत्तप्त गर्भ के अन्दर,
कीड़ों से रेंगा करते–
वे ख़ून पसीना करते !

वे अन्न अनाज उगाते,
वे ऊंचे महल उठाते,
कोयले लोहे सोने से
धरती पर स्वर्ग बसाते,
वे पेट सभी का भरते
पर ख़ुद भूखों मरते हैं !

वे ऊंचे महल उठाते
पर ख़ुद गन्दी गलियों में–
क्षत-विक्षत झोपड़ियों में–
आकाशी छत के नीचे
गर्मी सर्दी बरसातें,
काटते दिवस औ’ रातें !

वे जैसे बनता जीते,
वे उकड़ू बैठा करते,
वे पैर न फैला पाते,
सिकुड़े-सिकुड़े सो जाते !

अनभिज्ञ बाँह के बल से,
अनजान संगठन बल से,
ये मूक, मूढ़, नत निर्धन,
दुनिया के बाज़ारों में,
कौड़ी कौड़ी को बिकते
पैरों से रौंदे जाते,
ये चींटी से पिस जाते !

ये रोग लिए आते हैं
बीवी को दे जाते हैं,
ये रोग लिए आते हैं
रोगी ही मर जाते हैं !

फिर वे हैं जो महलों में
तारों से कुछ ही नीचे
सुख से निज आँखें मीचें
निज सपने सच्चे करते
मखमली बिस्तरों पर से,
टेलीफूनों के ऊपर
पैतृक पूँजी के बल से,
बिन मेहनत के पैसे से–
दुनिया को दोलित करते !

निज बहुत बड़ी पूँजी से,
छोटी पूँजियाँ हड़प कर
धीरे – धीरे समाज के
अगुआ ये ही बन जाते,
नेता ये ही बन जाते,
शासक ये ही बन जाते!

शासन की भूख न मिटती,
शोषण की भूख न मिटती,
ये भिन्न – भिन्न देशों में
छल के व्यापार सजाते
पूँजी के जाल बिछाते,
ये और और बढ़ जाते!

तब इन जैसा ही कोई
यदि टक्कर का मिल जाता,
औ’ ताल ठोंक भिड़ जाता
तो महायुद्ध छिड़ जाता!
तब नाम धर्म का लेकर,
कर्तव्य कर्म का लेकर,
संस्कृति के मिट जने का,
मानवता के संकट का,
भोले जन को भय देकर
सबको युद्धातुर करते !

तो, बड़ी – बड़ी फ़ौजों में
नरजन हो जाते भरती
निर्धन हो जाते भरती
लाखों बेकार बिचारे
वर्दियाँ फ़ौज की धारे,
जल में, थल में, अम्बर में,
कुछ चाँदी के टुकड़ों पर
ये बिना मौत ख़ुद मरते!

मरते ये ही न अकेले
नभ से फेंके गोलों से,
टैंकों से औ’ तोपों से !
विज्ञान विनिमित अनगिन
अनजाने हथियारों से–
भोले जन मारे जाते!

बूढ़े भी मारे जाते,
नारी भी मारी जाती,
दुधमुँहे गोद के शिशु भी
नि:शंक संहारे जाते !
होती न जहाँ बमबारी,
बचते न वहाँ के जन भी,
व्यापार मन्द पड़ जाता,
आवश्यक अन्न न मिलता,
धनवानों की बन आती
वे गेहूँ औ’ चावल का
मन चाहा मूल्य चढ़ाते,
मौक़ा पाते ही लाला
थैलियाँ ख़ूब सरकाते !
तो महाकाल आ जाता,
भीषण अकाल पड़ जाता,
बेबस भूखे नंगों को
चुटकी में चट कर जाता !
जो बचते उन के तन में,
घुन सी लगती बीमारी,
गुपचुप जर्जर प्राणों को
खा जाती यह हत्यारी !

यों स्वार्थ – सिद्धी युद्धों में,
अनगिन अबोध पिस जाते,
पूँजीपतियों की बढ़ती
लालच की ज्वालाओं में
अपने तन-मन की, धन की,
अपने अमूल्य जीवन की,
ये आहुतियाँ दे जाते !

युद्धोपरान्त बदले में
ये बेचारे क्या पाते ?
फिर से दर – दर की ठोकर,
फिर से अकाल बीमारी,
फिर दुखदायी बेकारी !

पूँजीवादी सिस्टम को
क्षत – विक्षत मैशीनरी का
जंग लगे घिसे हिस्सों का
उपचार न कुछ हो पाता !
झुँझलाते असफलता पर,
अफ़सर निकृष्ट सरकारी !

चक्कर खाती धरती के
संग यह इतिहास पुराना
फिर – फिर चक्कर खाता है
फिर – फिर दुहराया जाता!

निर्धन के लाल लहू से
लिखा कठोर घटना-क्रम
यों ही आए जाएगा
जब तक पीड़ित धरती से
पूँजीवादी शासन का
नत निर्बल के शोषण का
यह दाग न धुल जाएगा,
तब तक ऎसा घटना-क्रम
यों ही आए – जाएगा
यों ही आए – जाएगा !

(1947 में रचित)

चाचा से

न दो अब एटम बम की धमकी चाचा,
और कोई हथियार निकालो,
कि इसकी धार है खुट्टल ट्रूमन चाचा,
और कोई तलवार निकालो !

चीन में क्या, दुनिया में उगा है लाल सितारा,
लिए डालर की गड्डी, च्याँग परलोक सिधारा,
कि चिट्ठी लिखो, सोच कर लिख दो चाचा,
ढूँढ के बर्ख़ुरदार निकालो,
एक नया गद्दार निकालो !

जंग की बात न छेड़ो, लोग बेहद बिगड़ेंगे,
समय के सौ-सौ तूफ़ाँ, न जाने क्या कर देंगे !
सोवियत मज़दूरों का, लोग उनसे न लड़ेंगे,
ये बिजनेस खोटा, इसमें टोटा लाला,
और कोई व्यापार निकालो,
दूजा कारोबार निकालो !

(1949 में रचित)

मुझको भी इंग्लैंड ले चलो

मुझको भी इंग्लैंड ले चलो, पण्डित जी महराज,
देखूँ रानी के सिर कैसे धरा जाएगा ताज !

बुरी घड़ी में मैं जन्मा जब राजे और नवाब,
तारे गिन-गिन बीन रहे थे अपने टूटे ख़्वाब,
कभी न देखा हरम, चपल छ्प्पन छुरियों का नाच,
कलजुग की औलाद, मिली है किस्मत बड़ी ख़राब,
दादी मर गई, कर गई रूप कथा से भी मुहताज !

तुम जिनके जाते हो उनका बहुत सुना है नाम,
सुनता हूँ, उस एक छत्र में कभी न होती शाम,
काले, पीले, गोरे, भूरे, उनके अनगिन दास,
साथ किसी के साझेदारी औ’ कोई बेदाम,
ख़ुश होकर वे लोगों को दे देती हैं सौराज !

उनका कामनवैल्थ कि जैसे दोधारी तलवार,
एक वार से हमें जिलावें , करें एक से ठार,
घटे पौण्ड की पूँछ पकड़ कर रुपया माँगे भीख,
आग उगलती तोप कहीं पर, कहीं शुद्ध व्यापार,
कहीं मलाया और कहीं सर्वोदय सुखी समाज !

रूमानी कविता लिखता था सो अब लिखी न जाए,
चारों ओर अकाल, जिऊँ मैं कागद-पत्तर खाय?
मुझे साथ ले चलो कि शायद मिले नई स्फूर्ति,
बलिहारी वह दॄश्य, कल्पना अधर-अधर लहराए–
साम्राज्य के मंगल तिलक लगाएगा सौराज !

(1953 में रचित)

 

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