नुसखा-ए-उलफ़त मेरा-कविता-रसूल हमज़ातोव-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rasul Gamzatov(Rasool Hamzatov) 

नुसखा-ए-उलफ़त मेरा-कविता-रसूल हमज़ातोव-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rasul Gamzatov(Rasool Hamzatov)

गर किसी तौर हर इक उलफ़ते-जानां का ख़्याल
शे’र में ढल के सना-ए-रुख़े-जानाना बने
फिर तो यूं हो कि मेरे शेरो-सुख़न का दफ़तर
तूल में तूले-शबे-हजर का अफ़साना बने
है बहुत तिशना मगर नुसखा-ए-उलफ़त मेरा
इस सबब से कि हर इक लमहा-ए-फ़ुरस्त मेस
दिल ये कहता है कि हो कुर्बते जानां में बसर

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