नीहार-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Neehar Part 5

नीहार-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Neehar Part 5

 फिर एक बार

मैं कम्पन हूँ तू करुण राग
मैं आँसू हूँ तू है विषाद,
मैं मदिरा तू उसका खुमार
मैं छाया तू उसका अधार;

मेरे भारत मेरे विशाल
मुझको कह लेने दो उदार!
फिर एक बार बस एक बार!

जिनसे कहती बीती बहार
’मतवालो जीवन है असार’!
जिन झंकारों के मधुर गान
ले गया छीन कोई अजान,

उन तारों पर बनकर विहाग
मंड़रा लेने दो हे उदार!
फिर एक बार बस एक बार!

कहता है जिनका व्यथित मौन
’हम सा निष्फल है आज कौन’!
निर्धन के धन सी हास रेख
जिनकी जग ने पायी ने देख,

उन सूखे ओठों के विषाद-
में मिल जाने दो हे उदार!
फिर एक बार बस एक बार!

जिन पलकों में तारे अमोल
आँसू से करते हैं किलोल,
जिन आँखों का नीरव अतीत
कहता ‘मिटना है मधुर जीत’;

उस चिन्तित चितवन में विहास
बन जाने दो मुझको उदार!
फिर एक बार बस एक बार!

फूलों सी हो पल में मलीन
तारों सी सूने में विलीन,
ढुलती बूँदों से ले विराग
दीपक से जलने का सुहाग;

अन्तरतम की छाया समेट
मैं तुझमें मिट जाऊँ उदार!
फिर एक बार बस एक बार!

 मेरा एकान्त

कामना की पलकों में झूल
नवल फूलों के छूकर अंग,
लिए मतवाला सौरभ साथ
लजीली लतिकाएं भर अंक,

यहाँ मत आओ मत्त समीर!
सो रहा है मेरा एकान्त!

लालसा की मदिरा में चूर
क्षणिक भंगुर यौवन पर भूल,
साथ लेकर भौरों की भीर
विलासी हे उपवन के फूल!

बनाओ इसे न लीला भूमि
तपोवन है मेरा एकान्त!

निराली कल कल में अभिराम
मिलाकर मोहक मादक गान,
छलकती लहरों में उद्दाम
छिपा अपना अस्फुट आह्वान,

न कर हे निर्झर! भंग समाधि
साधना है मेरा एकांत!

विजन वन में बिखरा कर राग
जगा सोते प्राणों की प्यास,
ढालकर सौरभ में उन्माद
नशीली फैलाकर निश्वास,

लुभाओ इसे न मुग्ध बसंत!
विरागी है मेरा एकान्त!

गुलाबी चल चितवन में बोर
सजीले सपनों की मुस्कान,
झिलमिलाती अवगुण्ठन ड़ाल
सुनाकर परिचित भूली तान,

जला मत अपना दीपक आश!
न खो जाये मेरा एकान्त!

 सूना संदेश

हुए हैं कितने अन्तर्धान
छिन्न होकर भावों के हार,

घिरे घन से कितने उच्छवास
उड़े हैं नभ में होकर क्षार;

शून्य को छूकर आये लौट
मूक होकर मेरे निश्वास,

बिखरती है पीड़ा के साथ
चूर होकर मेरी अभिलाष!

छा रही है बनकर उन्माद
कभी जो थी अस्फुट झंकार,

काँपता सा आँसू का बिन्दु
बना जाता है पारावार।

खोज जिसकी वह है अज्ञात
शून्य वह है भेजा जिस देश,

लिए जाओ अनन्त के पार
प्राण वाहक सूना संदेश!

अनन्त की ओर

गरजता सागर तम है घोर
घटा घिर आई सूना तीर,
अंधेरी सी रजनी में पार
बुलाते हो कैसे बेपीर?

नहीं है तरिणी कर्णाधार
अपरिचित है वह तेरा देश,
साथ है मेरे निर्मम देव!
एक बस तेरा ही संदेश।

हाथ में लेकर जर्जर बीन
इन्हीं बिखरे तारों को जोर,
लिए कैसे पीड़ा का भार
देव जाऊँ अनन्त की ओर!

वरदान

तरल आँसू की लड़ियाँ गूँथ
इन्हीं ने काटी काली रात,
निराशा का सूना निर्माल्य
चढ़ाकर देखा फीका प्रात।

इन्हीं पलकों ने कंटक हीन
किया था वह मारग बेपीर,
जहाँ से छूकर तेरे अंग
कभी आता था मंद समीर!

सजग लखतीं थी तेरी राह
सुलाकर प्राणों में अवसाद;
पलक प्यालों से पी पी देव!
मधुर आसव सी तेरी याद।

अशन जल का जल ही परिधान
रचा था बूँदों में संसार,
इन्हीं नीले तारों में मुग्ध
साधना सोती थी साकार

आज आये हो हे करुणेश!
इन्हें जो तुम देने वरदान,
गलाकर मेरे सारे अंग
करो दो आँखों का निर्माण!

नीरव भाषण

गिरा जब हो जाती है मूक
देख भावों का पारावार,
तोलते हैं जब बेसुध प्राण
शून्य से करुण कथा का भार;
मौन बन जाता आकर्षण
वहीं मिलता नीरव भाषण।

जहाँ बनता पतझार वसन्त
जहाँ जागृति बनती उन्माद,
जहाँ मदिरा देती चैतन्य
भूलना बनता मीठी याद;
जहाँ मानस का मुग्ध मिलन
वहीं मिलता नीरव भाषण।

जहाँ विष देता है अमरत्व
जहाँ पीड़ा है प्यारी मीत,
अश्रु हैं नयनों का श्रॄंगार
जहाँ ज्वाला बनती नवनीत;
मृत्यु बन जाती नवजीवन
वहीं मिलता नीरव भाषण।

नहीं जिसमें अत्यंन्त विच्छेद
बुझा पाता जीवन की प्यास,
करुण नयनों का संचित मौन
सुनाता कुछ अतीत की बात;
प्रतीक्षा बन जाती अंजन
वहीं मिलता नीरव भाषण।

पहन कर जब आँसू के हार
मुस्करातीं वे पुतली श्याम,
प्राण में तन्मयता का हास
माँगता है पीड़ा अविराम;
वेदना बनती संजीवन
वहीं मिलता नीरव भाषण।

जहाँ मिलता पंकज का प्यार
जहाँ नभ में रहता आराध्य,
ढाल देना प्राणों में प्राण
जहाँ होती जीवन की साध;
मौन बन जाता आवाहन
वहीं मिलता नीरव भाषण।

जहाँ है भावों का विनिमय
जहाँ इच्छाओं का संयोग,
जहाँ सपनों में है अस्तित्व
कामनाओं में रहता योग;
महानिद्रा बनता जीवन
वहीं मिलता नीरव भाषण।

जहाँ आशा बनती नैराश्य
राग बन जाता है उच्छ्वास,
मधुर वीणा है अन्तर्नाद
तिमिर में मिलता दिव्य प्रकाश;
हास बन जाता है रोदन
वहीं मिलता नीरव भाषण।

फूल

मधुरिमा के, मधु के अवतार
सुधा से, सुषमा से, छविमान,
आंसुओं में सहमे अभिराम
तारकों से हे मूक अजान!
सीख कर मुस्काने की बान
कहां आऎ हो कोमल प्राण!

स्निग्ध रजनी से लेकर हास
रूप से भर कर सारे अंग,
नये पल्लव का घूंघट डाल
अछूता ले अपना मकरंद,
ढूढं पाया कैसे यह देश?
स्वर्ग के हे मोहक संदेश!

रजत किरणों से नैन पखार
अनोखा ले सौरभ का भार,
छ्लकता लेकर मधु का कोष
चले आऎ एकाकी पार;
कहो क्या आऎ हो पथ भूल?
मंजु छोटे मुस्काते फूल!

उषा के छू आरक्त कपोल
किलक पडता तेरा उन्माद,
देख तारों के बुझते प्राण
न जाने क्या आ जाता याद?
हेरती है सौरभ की हाट
कहो किस निर्मोही की बाट?

चांदनी का श्रृंगार समेट
अधखुली आंखों की यह कोर,
लुटा अपना यौवन अनमोल
ताकती किस अतीत की ओर?
जानते हो यह अभिनव प्यार
किसी दिन होगा कारगार?

कौन है वह सम्मोहन राग
खींच लाया तुमको सुकुमार?
तुम्हें भेजा जिसने इस देश
कौन वह है निष्ठुर करतार?
हंसो पहनो कांटों के हार
मधुर भोलेपन के संसार!

परिचय

जिसमें नहीं सुवास नहीं जो
करता सौरभ का व्यापार,
नहीं देख पाता जिसकी
मुस्कानों को निष्ठुर संसार !

जिसके आँसू नहीं माँगते
मघुपों से करुना की भीख,
मदिरा का व्यवसाय नहीं
जिसके प्राणों ने पाया सीख !

मोती बरसे नहीं न जिसको
धू पाया उन्मत्त बयार,
देखी जिसने हाट न जिस पर
ढुल जाता माली का प्यार
चढ़ा न देवों के चरणों पर
गूँथा गया न जिसका हार,
जिसका जीवन बना न अबतक
उन्मादों का स्वप्नागार !

निर्जनता के किसी अंधेरे
कोने में छिपकर चुपचाप,
स्वप्नलोक की मधुर कहानी
कहता सुनता अपने आप !

किसी अपरिचित डाली से
गिरकर जो नीरस वन का फूल,
फिर पथ में बिछकर आँखों में
चुपके से भर लेता धूल;

उसी सुमन सा पल भर हँसकर
सूने में हो छिन्न मलीन,
झड़ जाने दो जीवन-माली
मुझको रहकर परिचय हीन !

Leave a Reply