नीहार-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Neehar Part 4

नीहार-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Neehar Part 4

उत्तर

इस एक बूँद आँसू में
चाहे साम्राज्य बहा दो
वरदानों की वर्षा से
यह सूनापन बिखरा दो

इच्छा‌ओं की कम्पन से
सोता एकान्त जगा दो,
आशा की मुस्कराहट पर
मेरा नैराश्य लुटा दो ।

चाहे जर्जर तारों में
अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालो में
सुख का आसव छलका दो

मेरे बिखरे प्राणों में
सारी करुणा ढुलका दो,
मेरी छोटी सीमा में
अपना अस्तित्व मिटा दो !

पर शेष नहीं होगी यह
मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढा
तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !

आँसू

यहीं है वह विस्मृत संगीत
खो गयी है जिसकी झंकार,
यहीं सोते हैं वे उच्छवास
जहाँ रोता बीता संसार;

यहीं है प्राणों का इतिहास
यहीं बिखरे बसन्त का शेष,
नहीं जो अब आयेगा लौट
यही उसका अक्षय संदेश।

समाहित है अनन्त आह्वान
यही मेरे जीवन का सार,
अतिथि! क्या ले जाओगे साथ
मुग्ध मेरे आँसू दो चार?

मेरा जीवन

स्वर्ग का था नीरव उच्छवास
देव-वीणा का टूटा तार,
मृत्यु का क्षणभंगुर उपहार
रत्न वह प्राणों का श्रॄंगार;

नई आशाओं का उपवन
मधुर वह था मेरा जीवन!
क्षीरनिधि की थी सुप्त तरंग
सरलता का न्यारा निर्झर,
हमारा वह सोने का स्वप्न
प्रेम की चमकीली आकर;

शुभ्र जो था निर्मेघ गगन
सुभग मेरा संगी जीवन!

अलक्षित आ किसने चुपचाप
सुना अपनी सम्मोहन तान,
दिखाकर माया का साम्राज्य
बना ड़ाला इसको अज्ञान;

मोह मदिरा का आस्वादन
किया क्यों हे भोले जीवन!

तुम्हें ठुकरा जाता नैराश्य
हँसा जाती है तुमको आस,
नचाता मायावी संसार
लुभा जाता सपनों का हास;

मानते विष को संजीवन
मुग्ध मेरे भूले जीवन!

न रहता भौंरों का आह्वान
नहीं रहता फूलों का राज्य,
कोकिला होती अन्तर्धान
चला जाता प्यारा ऋतुराज;

असम्भव है चिर सम्मेलन,
न भूलो क्षणभंगुर जीवन!

विकसते मुरझाने को फूल
उदय होता छिपने को चंद,
शून्य होने को भरते मेघ
दीप जलता होने को मन्द;

यहां किसका अनन्त यौवन?
अरे अस्थिर छोटे जीवन।

छलकती जाती है दिन रैन
लबालब तेरी प्याली मीत,
ज्योति होती जाती है क्षीण
मौन होता जाता संगीत;

करो नयनों का उन्मीलन
क्षणिक हे मतवाले जीवन!

शून्य से बन जाओ गंभीर
त्याग की हो जाओ झंकार,
इसी छोटे प्याले में आज
डुबा ड़ालो सारा संसार;

लजा जायें यह मुग्ध सुमन
बनो ऐसे छोटे जीवन!

सखे! यह माया का देश
क्षणिक है मेरा तेरा संग,
यहाँ मिलता काँटों में बन्धु!
सजीला सा फूलों का रंग;

तुम्हे करना विच्छेद सहन
न भूलो हे प्यारे जीवन!

विस्मृति

जहाँ है निद्रामग्न वसंत
तुम्हीं हो वह सूखा उद्यान,
तुम्हीं हो नीरवता का राज्य
जहाँ खोया प्राणों ने गान;

निराली सी आँसू की बूँद
छिपा जिसमें असीम अवसाद,
हलाहल या मदिरा का घूँट
डुबा जिसने ड़ाला उन्माद!

जहाँ बन्दी मुरझाया फूल
कली की हो ऐसी मुस्कान,
ओस कण का छोटा आकार
छिपा जो लेता है तूफान;

जहाँ रोता है मौन अतीत
सखी! तुम हो ऐसी झंकार,
जहाँ बनती आलोक समाधि
तुम्हीं हो ऐसा अन्धाकार।

जहाँ मानस के रत्न विलीन
तुम्हीं हो ऐसा पारावार,
अपरिचित हो जाता है मीत
तुम्हीं हो ऐसा अंजनसार!

मिटा देता आँसू के दाग
तुम्हारा यह सोने सा रंग,
डुबा देती बीता संसार
तुम्हारी यह निस्तब्ध तरंग।

भस्म जिसमें हो जाता काल
तुम्हीं वह प्राणों का सन्यास,
लेखनी हो ऐसी विपरीत
मिटा जो जाती है इतिहास;

साधनाओं का दे उपहार
तुम्हें पाया है मैंने अन्त,
लुटा अपना सीमित ऐश्वर्य
मिला है यह वैराग्य अनन्त।

भुला ड़ालो जीवन की साध
मिटा ड़ालो बीते का लेश;
एक रहने देना यह ध्यान
क्षणिक है यह मेरा परदेश!

मोल

झिलमिल तारों की पलकों में
स्वप्निल मुस्कानों को ढाल,
मधुर वेदनाओं से भर के
मेघों के छायामय थाल;

रंग ड़ाले अपनी लाली में
गूँथ नये ओसों के हार,
विजन विपिन में आज बावली
बिखराती हो क्यों श्रृंगार?

फूलों के उच्छवास बिछाकर
फैला फैला स्वर्ण पराग,
विस्मॄति सी तुम मादकता सी
गाती हो मदिरा सा राग;

जीवन का मधु बेच रही हो
मतवाली आँखों में घोल
क्या लोगी? क्या कहा सजनि
‘इसका दुखिया आँसू है मोल’!

दीप

मूक कर के मानस का ताप
सुलाकर वह सारा उन्माद,
जलाना प्राणों को चुपचाप
छिपाये रोता अन्तर्नाद ;
कहाँ सीखी यह अद्भुत प्रीति?
मुग्ध हे मेरे छोटे दीप !

चुराया अन्तस्थल में भेद
नहीं तुमको वाणी की चाह,
भस्म होते जाते हैं प्राण
नहीं मुख पर आती है आह ;
मौन में सोता है संगीत-
लजीले मेरे छोटे दीप !

क्षार होता जाता है गात
वेदनाओं का होता अन्त,
किन्तु करते रहते हो मौन
प्रतीक्षा का आलोकित पन्थ ;
सिखा दो ना नेही की रीति-
अनोखे मेरे नेही दीप !

पड़ी है पीड़ा संज्ञाहीन
साधना में डूबा उद्गार,
ज्वाल में बैठा हो निस्तब्ध
स्वर्ण बनता जाता है प्यार ;
चिता है तेरी प्यारी मीत-
वियोगी मेरे बुझते दीप ?

अनोखे से नेही के त्याग
निराले पीड़ा के संसार
कहाँ होते हो अंतर्ध्यान
लुटा अपना सोने सा प्यार
कभी आएगा ध्यान अतीत
तुम्हें क्या निर्माणोन्मुख दीप

याद

निठुर होकर डालेगा पीस
इसे अब सूनेपन का भार,
गला देगा पलकों में मूंद
इसे इन प्राणों का उद्गार;

खींच लेगा असीम के पार
इसे छलिया सपनों का हास,
बिखरते उच्छ्वासों के साथ
इसे बिखरा देगा नैराश्य !

सुनहरी आशाओं का छोर
बुलाएगा इसको अज्ञात,
किसी विस्मृत वीणा का राग
बना देगा इसको उद्भ्रांत !

छिपेगी प्राणों में बन प्यास
घुलेगी आँखों में हो राग,
कहाँ फिर ले जाऊँ हे देव !
तुम्हारे उपहारों की याद ?

आँसू की माला

उच्छवासों की छाया में
पीड़ा के आलिंगन में,
निश्वासों के रोदन में
इच्छाओं के चुम्बन में;

सूने मानस मन्दिर में
सपनों की मुग्ध हँसी में;
आशा के आवाहन में
बीते की चित्रपटी में।

रजनी के अभिसारों में
नक्षत्रों के पहरों में
ऊषा के उपहासों में
मुस्काती सी लहरों में।

उन थकी हुई सोती सी
ज्योत्सना की मृदु पलकों में,
बिखरी उलझी हिलती सी
मलयानिल की अलकों में;

जो बिखर पड़े निर्जन में
निर्भर सपनों के मोती,
मैं ढूँढ रही थी लेकर
धंधली जीवन की ज्योती;

उस सूने पथ में अपने
पैरों की चाप छिपाये,
मेरे नीरव मानस में
वे धीरे धीरे आये!

मेरी मदिरा मधुवाली
आकर सारी लुढका दी,
हँसकर पीड़ा से भर दी
छोटी जीवन की प्याली;

मेरी बिखरी वीणा के
एकत्रित कर तारों को;
टूटे सुख के सपने दे
अब कहते हैं गाने को।

यह मुरझाये फूलों का
फीका सा मुस्काना है,
यह सोती सी पीड़ा को
सपनों से ठुकराना है;

गोधूली के ओठों पर
किरणों का बिखराना है,
यह सूखी पंखड़ियों में
मारुत का इठलाना है।

इस मीठी सी पीड़ा में
डूबा जीवन का प्याला,
लिपटी सी उतराती है
केवल आँसू की माला।

जो तुम आ जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार ।

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार ।

हंस उठते पल में आद्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग
आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार ।

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