नीरजा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma नीरजा-Part 8

नीरजा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma नीरजा-Part 8

विरह का जलजात जीवन

विरह का जलजात जीवन, विरह का जलजात!
वेदना में जन्म करुणा में मिला आवास;
अश्रु चुनता दिवस इसका, अश्रु गिनती रात!
जीवन विरह का जलजात!

आँसुओं का कोष उर, दृगु अश्रु की टकसाल;
तरल जल-कण से बने घन सा क्षणिक् मृदु गात!
जीवन विरह का जलजात!

अश्रु से मधुकण लुटाता आ यहाँ मधुमास!
अश्रु ही की हाट बन आती करुण बरसात!
जीवन विरह का जलजात!

काल इसको दे गया पल-आँसुओं का हार;
पूछता इसकी कथा निश्वास ही में वात!
जीवन विरह का जलजात!

जो तुम्हारा हो सके लीलाकमल यह आज,
खिल उठे निरुपम तुम्हारी देख स्मित का प्रात!
जीवन विरह का जलजात!

 बताता जा रे अभिमानी

बताता जा रे अभिमानी!

कण-कण उर्वर करते लोचन
स्पन्दन भर देता सूनापन
जग का धन मेरा दुख निर्धन
तेरे वैभव की भिक्षुक या
कहलाऊँ रानी!
बताता जा रे अभिमानी!

दीपक-सा जलता अन्तस्तल
संचित कर आँसू के बादल
लिपटी है इससे प्रलयानिल,
क्या यह दीप जलेगा तुझसे
भर हिम का पानी?
बताता जा रे अभिमानी!

चाहा था तुझमें मिटना भर
दे डाला बनना मिट-मिटकर
यह अभिशाप दिया है या वर;
पहली मिलन कथा हूँ या मैं
चिर-विरह कहानी!
बताता जा रे अभिमानी!

मुखर पिक हौले बोल

मुखर पिक हौले बोल !
हठीले हौले हौले बोल !

जाग लुटा देंगी मधु कलियां मधुप कहेंगे ‘और’
चौंक गिरेंगे पीले पल्लव अम्ब चलेंगे मौर;
समीरण मत्त उठेगा डोल !
हठीले हौले हौले बोल !

मर्मर की वंशी में गूंजेगा मधुॠतु का प्यार;
झर जावेगा कम्पित तृण से लघु सपना सुकुमार;
एक लघु आंसू बन बेमोल !
हठीले हौले हौले बोल !

‘आता कौन’ नीड़ तज पूछेगा विहगों का रोर;
दिग्वधुयों के घन-घूंघट के चंचल होंगे छोर;
पुलक से होंगे सजल कपोल !
हठीले हौले हौले बोल !

प्रिय मेरा निशीथ-नीरवता में आता चुपचाप;
मेरे निमिषों से भी नीरव है उसकी पदचाप;
सुभग! यह पल घड़ियां अनमोल !
हठीले हौले हौले बोल !

वह सपना बन बन आता जागृति में जाता लौट !
मेरे श्रवण आज बैठे हैं इन पलकों की ओट;
व्यर्थ मत कानों में मधु घोल !
हठीले हौले हौले बोल !

भर पावे तो स्वरलहरी में भर वह करुण हिलोर;
मेरा उर तज वह छिपने का ठौर न ढूंढे भोर;
उसे बांधूं फिर पलकें खोल !
हठीले हौले हौले बोल !

पथ देख बिता दी रैन

पथ देख बिता दी रैन
मैं प्रिय पहचानी नहीं!

तम ने धोया नभ-पंथ
सुवासित हिमजल से;
सूने आँगन में दीप
जला दिये झिल-मिल से;
आ प्रात बुझा गया कौन
अपरिचित, जानी नहीं!
मैं प्रिय पहचानी नहीं!

धर कनक-थाल में मेघ
सुनहला पाटल सा,
कर बालारूण का कलश
विहग-रव मंगल सा,
आया प्रिय-पथ से प्रात-
सुनायी कहानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !

नव इन्द्रधनुष सा चीर
महावर अंजन ले,
अलि-गुंजित मीलित पंकज-
-नूपुर रूनझुन ले,
फिर आयी मनाने साँझ
मैं बेसुध मानी नहीं!
मैं प्रिय पहचानी नहीं!

इन श्वासों का इतिहास
आँकते युग बीते;
रोमों में भर भर पुलक
लौटते पल रीते;
यह ढुलक रही है याद
नयन से पानी नहीं!
मैं प्रिय पहचानी नहीं!

अलि कुहरा सा नभ विश्व
मिटे बुद्‌बुद्‌‌-जल सा;
यह दुख का राज्य अनन्त
रहेगा निश्चल सा;
हूँ प्रिय की अमर सुहागिनि
पथ की निशानी नहीं!
मैं प्रिय पहचानी नहीं!

 इस जादूगरनी वीणा पर

इस जादूगरनी वीणा पर
गा लेने दो क्षण भर गायक !

पल भर ही गाया चातक ने
रोम रोम में प्यास प्यास भर !
काँप उठा आकुल सा अग जग,
सिहर गया तारोमय अम्बर;
भर आया घन का उर गायक !
गा लेने दो क्षण भर गायक !

क्षण भर ही गाया फूलों ने
दृग में जल अधरों में स्मित धर !
लघु उर के अनंत सौरभ से
कर डाला यह पथ नन्दन चिर;
पाया चिर जीवन झर गायक !
गा लेने दो क्षण भर गायक !

एक निमिष गाया दीपक ने
ज्वाला का हँस आलिंगन कर !
उस लघु पल से गर्वित है तू
लघु रजकण आभा का सागर,
गा लेने दो क्षण भर गायक !

एक घड़ी गा लूँ प्रिय मैं भी
मधुर वेदना से भर अन्तर !
दुख हो सुखमय सुख हो दुखमय,
उपल बनें पुलकित से निर्झर;
मरु हो जावे उर्वर गायक !
गा लेने दो क्षण भर गायक !

जग ओ मुरली की मतवाली

जग ओ मुरली की मतवाली !

दुर्गम पथ हो ब्रज की गलियाँ
शूलों में मधुवन की कलियाँ;
यमुना हो दृग के जलकण में,
वंशी ध्वनि उर की कम्पन में,
जो तू करुणा का मंगलघट ले
बन आवे गोरसवाली !
जग ओ मुरली की मतवाली !

चरणों पर नवनिधियाँ खेलीं,
पर तूने हँस पहनी सेली;
चिर जाग्रत थी तू दीवानी,
प्रिय की भिक्षुक दुख की रानी;
खारे दृग-जल से सींच-सींच
प्रिय की सनेह-वेली पाली!
जग ओ मुरली की मतवाली !

कंचन के प्याले का फेनिल,
नीलम सा तप सा हालाहल;
छू तूने कर डाला उज्जवल,
प्रिय के पदपद्मों का मधुजल;
फिर अपने मृदु कर से छूकर
मधु कर जा यह विष की प्याली !
जग ओ मुरली की मतवाली !

मरुशेष हुआ यह मानससर
गतिहीन मौन दृग के निर्झर;
इस शीत निशा का अन्त नहीं
आता पत्तझार वसन्त नहीं;
गा तेरे ही पञ्चम स्वर से
कुसुमित हो यह डाली डाली !
जग ओ मुरली की मतवाली !

प्रिय गया है लौट रात

प्रिय गया है लौट रात !

सजल धवल अलस चरण,
मूक मदिर मधुर करुण,
चाँदेनी है अश्रुस्नात !

सौरभ-मद ढाल शिथिल;
मृदु बिछा प्रवास वकुल;
सो गयी सी चपल वात !

युग युग जल मूक विकल,
पुलकित अब स्नेह-तरल,
दीपक है स्वप्नसात !

जिसके पदचिह्न विमल,
तारकों में अमिट विरल,
गिन रहे हैं नीर-जात !

किसकी पदचाप चकित,
जग उठे हैं जन्म अमित,
श्वास श्वास में प्रभात !

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