नीरजा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma नीरजा-Part 7

नीरजा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma नीरजा-Part 7

मेरे हँसते अधर नहीं जग-

मेरे हँसते अधर नहीं जग-
की आँसू-लड़ियाँ देखो !
मेरे गीले पलक छुओ मत
मुरझाई कलियाँ देखो !

हंस देता नव इन्द्रधनुष की –
स्मित में घन मिटता मिटता;
रंग जाता है विश्व राग से
निष्फल दिन ढलता ढलता;
कर जाता संसार सुरभिमय
एक सुमन झरता झरता;
भर जाता आलोक तिमिर में
लघु दीपक बुझता बुझता;

मिटनेवालों की हे निष्ठुर !
बेसुध रंगरलियाँ देखो !
मैरे गीले पलक छुओ मत
मुरझाई कलियाँ देखो !

गल जाता लघु बीज असंख्यक
नश्वर बीज बनाने को;
तजता पल्लव वृन्त पतन के
हेतु नये विकसाने को,
मिटता लघु पल प्रिय देखो
कितने युग कल्प मिटाने को;
भूल गया जग भूल विपुल
भूलोंमय सृष्टि रचाने को !

मेरे बन्धन आज नहीं प्रिय,
संसृति की कड़ियाँ देखो !
मेरे गीले पलक छुओ मत
मुरझायी कलियाँ देखो !

श्वासें कहतीं ‘आता प्रिय’
नि:श्वास बताते ‘वह जाता’,
आँखों ने समझा अनजाना
उर कहता चिर यह नाता
सुधि से सुन ‘वह स्वप्न सजीला
क्षण क्षण नूतन बन आता’;
दुख उलझन में राह न पाता
सुख दृग-जल में बह जाता;

मुझमें हो तो आज तुम्हीं ‘मैं’
बन दुख की घड़ियाँ देखो !
मेरे गीले पलक छुओ मत
बिखरी पंखुरियाँ देखो !

मैं बनी मधुमास आली

मैं बनी मधुमास आली!

आज मधुर विषाद की घिर करुण आई यामिनी,
बरस सुधि के इन्दु से छिटकी पुलक की चाँदनी
उमड़ आई री, दृगों में
सजनि, कालिन्दी निराली!

रजत स्वप्नों में उदित अपलक विरल तारावली,
जाग सुक-पिक ने अचानक मदिर पंचम तान लीं;
बह चली निश्वास की मृदु
वात मलय-निकुंज-वाली!

सजल रोमों में बिछे है पाँवड़े मधुस्नात से,
आज जीवन के निमिष भी दूत है अज्ञात से;
क्या न अब प्रिय की बजेगी
मुरलिका मधुराग वाली?

मैं मतवाली इधर, उधर

मैं मतवाली इधर, उधर मेरा प्रिय अलबेला सा है।

मेरी आँखों में ढलकर
छबि उसकी मोती बन आई,
उसके घन-प्यालों में है
विद्युत सी मेरी परछाई,
नभ में उसके दीप, स्नेह
जलता है पर मेरा उनमें,
मेरे हैं यह प्राण, कहानी
पर उसकी हर कम्पन में;
यहाँ स्वप्न की हाट वहाँ अलि छाया का मेला सा है !

उसकी स्मित लुटती रहती
कलियों में मेरे मधुवन की;
उसकी मधुशाला में बिकती
मादकता मेरे मन की;
मेरा दुख का राज्य मधुर
उसकी सुधि के पल रखवाले;
उसका सुख का कोष, वेदना
के मैंने ताले डाले;
वह सौरभ का सिंधु मधुर जीवन मधु की बेला सा है ।

मुझे न जाना अलि ! उसने
जाना इन आंखों का पानी;
मैंने देखा उसे नहीं
पदध्वनि है केवल पहचानी;
मेरे मानस में उसकी स्मृति
भी तो विस्मृति बन आती;
उसके नीरव मन्दिर में
काया भी छाया हो जाती;
क्यों यह निर्मल खेल सजनि ! उसने मुझसे खेला सा है।

जाने किसकी स्मित रूम-झूम

जाने किसकी स्मित रूम झूम,
जाती कलियों को चूम चूम !

उनके लघु उर में जग; अलसित,
सौरभ-शिशु चल देता विस्मित;
हौले मृदु पद से डोल डोल,
मृदु पंखुरियों के द्वार खोल !

कुम्हला जाती कलिका अजान,
हमें सुरभित करता विश्व, घूम !

जाने किसकी छवि रूम झूम,
जाती मेघों को चूम चूम !

वे मंथर जल के बिन्दु चकित,
नभ को तज ढुल पड़ते विचलित !
विद्युत के दीपक ले चंचल,
सागर-सा गर्जन कर निष्फल,

घन थकते उनको खोज खोज,
फिर मिट जाते ज्यों विफल धूम !

जाने किसकी ध्वनि रूम झूम,
जाती अचलों को चूम चूम !

उनके जड़ जीवन में संचित,
सपने बनते निर्झर पुलकित;
प्रस्तर के कण घुल घुल अधीर,
उसमें भरते नव-स्नेह नीर !

वह बह चलता अज्ञात देश,
प्यासों में भरता प्राण, झूम !

जाने किसकी सुधि रूम झूम,
जाती पलकों को चूम चूम !

उर-कोशों के मोती अविदित,
बन पिघल पिघलकर तरल रजत,
भरते आंखों में बार बार,
रोके न आज रुकते अपार;

मिटते ही जाते हैं प्रतिपल,
इन धूलि-कणों के चरण-चूम !

ओ पागल संसार

ओ पागल संसार!
माँग न तू हे शीतल तममय!
जलने का उपहार!

करता दीपशिखा का चुम्बन,
पल में ज्वाला का उन्मीलन;
छूते ही करना होगा
जल मिटने का व्यापार!
ओ पागल संसार!

दीपक जल देता प्रकाश भर,
दीपक को छू जल जाता घर,
जलने दे एकाकी मत आ
हो जावेगा क्षार!
ओ पागल संसार!

जलना ही प्रकाश उसमें सुख
बुझना ही तम है तम में दुख;
तुझमें चिर दुख, मुझमें चिर सुख
कैसे होगा प्यार!
ओ पागल संसार!

शलभ अन्य की ज्वाला से मिल,
झुलस कहाँ हो पाया उज्जवल!
कब कर पाया वह लघु तन से
नव आलोक-प्रसार!
ओ पागल संसार!

अपना जीवन-दीप मृदुलतर,
वर्ती कर निज स्नेह-सिक्त उर;
फिर जो जल पावे हँस-हँस कर
हो आभा साकार!
ओ पागल संसार!

रुपसि तेरा घन-केश पाश

रुपसि तेरा घन-केश पाश!
श्यामल श्यामल कोमल कोमल,
लहराता सुरभित केश-पाश!

नभगंगा की रजत धार में,
धो आई क्या इन्हें रात?
कम्पित हैं तेरे सजल अंग,
सिहरा सा तन हे सद्यस्नात!
भीगी अलकों के छोरों से
चूती बूँदे कर विविध लास!
रुपसि तेरा घन-केश पाश!

सौरभ भीना झीना गीला
लिपटा मृदु अंजन सा दुकूल;
चल अञ्चल से झर झर झरते
पथ में जुगनू के स्वर्ण-फूल;
दीपक से देता बार बार
तेरा उज्जवल चितवन-विलास!
रुपसि तेरा घन-केश पाश!

उच्छ्वसित वक्ष पर चंचल है
बक-पाँतों का अरविन्द-हार;
तेरी निश्वासें छू भू को
बन बन जाती मलयज बयार;
केकी-रव की नूपुर-ध्वनि सुन
जगती जगती की मूक प्यास!
रुपसि तेरा घन-केश पाश!

इन स्निग्ध लटों से छा दे तन,
पुलकित अंगों से भर विशाल;
झुक सस्मित शीतल चुम्बन से
अंकित कर इसका मृदुल भाल;
दुलरा देना बहला देना,
यह तेरा शिशु जग है उदास!
रुपसि तेरा घन-केश पाश!

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