नीरजा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma नीरजा-Part 3

नीरजा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma नीरजा-Part 3

मुस्काता संकेत-भरा नभ

मुस्काता संकेत-भरा नभ
अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ?

विद्युत के चल स्वर्णपाश में बँध हँस देता रोता जलधर ;
अपने मृदु मानस की ज्वाला गीतों से नहलाता सागर ;
दिन निशि को, देती निशि दिन को
कनक-रजत के मधु-प्याले हैं !
अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ?

मोती बिखरातीं नूपुर के छिप तारक-परियाँ नर्तन कर ;
हिमकण पर आता जाता, मलयानिल परिमल से अंजलि भर ;
भ्रान्त पथिक से फिर-फिर आते
विस्मित पल क्षण मतवाले हैं !
अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ?

सघन वेदना के तम में, सुधि जाती सुख-सोने के कण भर ;
सुरधनु नव रचतीं निश्वासें, स्मित का इन भीगे अधरों पर ;
आज आँसुओं के कोषों पर,
स्वप्न बने पहरे वाले हैं !
अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ?

नयन श्रवणमय श्रवण नयनमय आज हो रही कैसी उलझन !
रोम रोम में होता री सखी एक नया उर का-सा स्पन्दन !
पुलकों से भर फूल बन गये
जितने प्राणों के छाले हैं !
अलि क्या प्रिय आनेवाले हैं ?

लाए कौन संदेश नए घन

लाए कौन संदेश नए घन!

अम्बर गर्वित,
हो आया नत,
चिर निस्पंद हृदय में उसके
उमड़े री पुलकों के सावन!
लाए कौन संदेश नए घन!

चौंकी निद्रित,
रजनी अलसित,
श्यामल पुलकित कंपित कर में
दमक उठे विद्युत के कंकण!
लाए कौन संदेश नए घन!

दिशि का चंचल,
परिमल-अंचल,
छिन्न हार से बिखर पड़े सखि!
जुगनू के लघु हीरक के कण!
लाए कौन संदेश नए घन!

जड़ जग स्पंदित,
निश्चल कम्‍पि‍‍त,
फूट पड़े अवनी के संचित
सपने मृदुतम अंकुर बन बन!
लाए कौन संदेश नए घन!

रोया चातक,
सकुचाया पिक,
मत्त मयूरों ने सूने में
झड़ियों का दुहराया नर्तन!
लाए कौन संदेश नए घन!

सुख दुख से भर,
आया लघु उर,
मोती से उजले जलकण से
छाए मेरे विस्मि‍त लोचन!
लाए कौन संदेश नए घन!

तुम दुख बन इस पथ से आना

तुम दुख बन इस पथ से आना !

शूलों में नित मृदु पाटल सा;
खिलने देना मेरा जीवन;
क्या हार बनेगा वह जिसने
सीखा न हृदय को बिंधवाना !

वह सौरभ हूँ मैं जो उड़कर
कलिका में लौट नहीं पाता,
पर कलिका के नाते ही प्रिय
जिसको जग ने सौरभ जाना !

नित जलता रहने दो तिल तिल,
अपनी ज्वाला में उर मेरा;
इसकी विभूति में फिर आकर
अपने पद-चिह्न बना जाना !

वर देते हो तो कर दो ना,
चिर आँखमिचौनी यह अपनी;
जीवन में खोज तुम्हारी है
मिटना ही तुमको छू पाना !

प्रिय ! तेरे उर में जग जावे,
प्रतिध्वनि जब मेरे पी पी की;
उसको जग समझे बादल में
विद्युत् का बन बन मिट जाना !

तुम चुपके से आ बस जाओ,
सुख-दुख सपनों में श्वासों में;
पर मन कह देगा ‘यह वे हैं’
आँखें कह देंगी ‘पहचाना’ !

जड़ जग के अणुयों में स्मित से,
तुमने प्रिय जब डाला जीवन,
मेरी आँखों ने सींच उन्हें
सिखलाया हँसना खिल जाना !

कुहरा जैसे घन आतप में,
यह संसृति मुझमें लय होगी;
अपने रागों में लघु वीणा
मेरी मत आज जगा जाना !

तुम दुख बन इस पथ से आना !

प्रिय सुधि भूले री मैं पथ भूली

प्रिय सुधि भूले री मैं पथ भूली !

मेरे ही मृदु उर में हंस बस,
श्वासों में भर मादक मधु-रस,
लघु कलिका के चल परिमल से
वे नभ छाए री मैं वन फूली !
प्रिय सुधि भूले री मैं पथ भूली !

तज उनका गिरि सा गुरु अंतर
मैं सिकता-कण सी आई झर;
आज सजनि उनसे परिचय क्या !
वे घन-चुंबित मैं पथ-धूली !
प्रिय सुधि भूले री मैं पथ भूली !

उनकी वीणा की नव कंपन,
डाल गई री मुझ में जीवन;
खोज न पाई उसका पथ मैं
प्रतिध्वनि भी सूने में झूली !
प्रिय सुधि भूले री मैं पथ भूली !

Leave a Reply