नीरजा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma नीरजा-Part 2

नीरजा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma नीरजा-Part 2

जाग बेसुध जाग

जाग बेसुध जाग!
अश्रुकण से उर सजाया त्याग हीरक हार
भीख दुख की मांगने फिर जो गया, प्रतिद्वार
शूल जिसने फूल छू चंदन किया, संताप
सुन जगाती है उसी सिध्दार्थ की पदचाप
करुणा के दुलारे जाग!

शंख में ले नाश मुरली में छिपा वरदान
दृष्टि में जीवन अधर में सृष्टि ले छविमान
आ रचा जिसने विपिन में प्यार का संसार
गूंजती प्रतिध्वनि उसी की फिर क्षितिज के पार
वृंदा विपिन वाले जाग!

रात के पथहीन तम में मधुर जिसके श्वास
फैले भरते लघुकणों में भी असीम सुवास
कंटकों की सेज जिसकी ऑंसुओं का ताज
सुभग, हँस उठ, उस प्रफुल्ल गुलाब ही सा आज
बीती रजनी प्यारे जाग!

लय गीत मदिर

लय गीत मदिर, गति ताल अमर;
अप्सरि तेरा नर्तन सुन्दर !

आलोक-तिमिर सित-असित चीर !
सागर-गर्जन रुनझुन मंजीर;
उड़ता झंझा में अलक-जाल,
मेघों में मुखरित किंकिण-स्वर !
अप्सरि तेरा नर्तन सुन्दर !

रवि-शशि तेरे अवतंस लोल,
सीमन्त-जटित तारक अमोल,
चपला विभ्रम, स्मित इन्द्रधनुष,
हिमकण बन झरते स्वेद-निकर !
अप्सरि तेरा नर्तन सुन्दर !

युग हैं पलकों का उन्मीलन
स्पन्दन में अगणित लय-जीवन
तेरी श्वासों में नाच नाच
उठता बेसुध जग सचराचर !
अप्सरि तेरा नर्तन सुन्दर !

तेरी प्रतिध्वनि बनती मधुदिन,
तेरी समीपता पावस-क्षण
रुपसि ! छूते ही तुझमें मिट,
जड़ पा लेता -वरदान अमर !
अप्सरि तेरा नर्तन सुन्दर !

जड़ कण कण के प्याले झलमल,
छलकी जीवन-मदिरा छलछल;
पीती थक झुक-झुक झूम-झूम;
तू घूँट घूँट फेनिल सीकर !
अप्सरि तेरा नर्तन सुन्दर !

बिखराती जाती तू सहास,
नव तन्मयता उल्लास लास;
हर अणु कहता उपहार बनूँ
पहले छू लूँ जो मृदुल अधर !
अप्सरि तेरा नर्तन सुन्दर !

है सृष्टि-प्रलय के आलिंगन !
सीमा-असीम के मूक मिलन !
कहता है तुझको कौन घोर,
तू चिर रहस्यमयि कोमलतर !
अप्सरि तेरा नर्तन सुन्दर !

तेरे हित जलते दीप-प्राण;
खिलते प्रसून हँसते विहान;
श्यामांगिनि ! तेरे कौतुक को
बनता जग मिट-मिट सुन्दरतर !
प्रिय-प्रेयसि ! तेरा लास अमर !

यह पतझर मधुवन भी हो

यह पतझर मधुवन भी हो !

दुख सा तुषार सोता हो
बेसुध सा जब उपवन में,
उस पर छलका देती हो
वन-श्री मधु भर चितवन में;
शूलों का दंशन भी हो
कलियों का चुंबन भी हो !

सूखे पल्लव फिरते हों
कहने जब करुण कहानी,
मारुत परिमल का आसन
नभ दे नयनों का पानी;
जब अलिकुल का क्रंदन हो
पिक का कल कूजन भी हो !

जब संध्या ने आँसू में
अंजन से हो मसि घोली,
तब प्राची के अंचल में
हो स्मित से चर्चित रोली;
काली अपलक रजनी में
दिन का उन्मीलन भी हो !

जब पलकें गढ़ लेती हों
स्वाती के जल बिन मोती,
अधरों पर स्मित की रेखा
हो आकर उनको धोती;
निर्मम निदाघ में मेरे
करुणा का नव घन भी हो !

झरते नित लोचन मेरे हों

झरते नित लोचन मेरे हों !

जलती जो युग युग से उज्जवल,
आभा से रच रच मुक्ताहल,
वह तारक-माला उनकी,
चल विद्युत के कंकण मेरे हों !
झरते नित लोचन मेरे हों !

ले ले तरल रजत औ’ कंचन,
निशि-दिन ने लीपा जो आँगन,
वह सुषमामय नभ उनका,
पल पल मिटते नव घन मेरे हों !
झरते नित लोचन मेरे हों !

पद्मराग-कलियों से विकसित,
नीलम के अलियों से मुखरित,
चिर सुरभित नंदन उनका,
यह अश्रुभार-नत तृण मेरे हों !
झरते नित लोचन मेरे हों !

तम सा नीरव नभ सा विस्तृत,
हास रुदन से दूर अपरिचित;
वह सूनापन हो उनका,
यह सुखदुखमय स्पंदन मेरे हों !
झरते नित लोचन मेरे हों !

जिसमें कसक न सुधि का दंशन,
प्रिय में मिट जाने के साधन,
वे निर्वाण-मुक्ति उनके,
जीवन के शत-बंधन मेरे हों !
झरते नित लोचन मेरे हों !

बुद्बुद् में आवर्त अपरिमित;
कण में शत जीवन परिवर्तित,
हों चिर सृष्टि-प्रलय उनके,
बनने-मिटने के क्षण मेरे हों !
झरते नित लोचन मेरे हों !

सस्मित पुलकित नित परिमलमय,
इंद्रधनुष सा नवरंगोंमय,
अग जग उनका कण कण उनका,
पल भर वे निर्मम मेरे हों !
झरते नित लोचन मेरे हों !

कहता जग दुख को प्यार न कर

कहता जग दुख को प्यार न कर !

अनबींधे मोती यह दृग के
बँध पाये बन्धन में किसके?
पल पल बनते पल पल मिटते,
तू निष्फल गुथ गुथ हार न कर
कहता जग दुख को प्यार न कर !

दर्पणमय है अणु अणु मेरा,
प्रतिबिम्बित रोम रोम तेरा;
अपनी प्रतिछाया से भोले!
इतनी अनुनय मनुहार न कर!
कहता जग दुख को प्यार न कर !

सुख-मधु मे क्या दुख का मिश्रण?
दुख-विष में क्या सुख-मिश्री-कण!
जाना कलियों के देश तुझे
तो शूलों से श्रंगार न कर!
कहता जग दुख को प्यार न कर !

मत अरुण घूँघट खोल री (घूँघट)

मत अरुण घूँघट खोल री !

वृन्त बिन नभ में खिले जो;
अश्रु बरसाते हंसे जो,
तारकों के वे सुमन
मत चयन कर अनमोल री !

तरल सोने से धुलीं यह,
पद्मरागों से सजीं यह,
उलझ अलकें जायँगी
मत अनिलपथ में डोल री !

निशि गयी मोती सजाकर,
हाट फूलों में लगाकर,
लाज से गल जायँगे
मत पूछ इनसे मोल री !

स्वर्ण-कुमकुम में बसा कर:
है रंगी नव मेघ-चुनरू
बिछल मत धुल जायगी
इन लहरियों में लोल री !

चांदनी की सित सुधा भर,
बांटता इनसे सुधाकर,
मत कली की प्यालियों में
लाल मदिरा घोल री !

पलक सीपें नींद का जल;
स्वप्न-मुक्ता रच रहे, मिल,
हैं न विनिमय के लिए
स्मित से इन्हें मत तोल री !

खेल सुख-दुख से चपल थक,
सो गया जग-शिशु अचानक,
जाग मचलेगा न तू
कल खग-पिकों में बोल री !

दूर घर मैं पथ से अनजान

दूर घर मैं पथ से अनजान !

मेरी ही चितवन से उमड़ा तम का पारावार;
मेरी आशा के नवअंकुर शूलों में साकार;
पुलिन सिकतामय मेरे प्राण !

मेरी निश्वासों से बहती रहती झंझावात;
आंसू में दिनरात प्रलय के घन करते उतपात;
कसक में विद्युत् अन्तर्धान !

मेरी ही प्रतिध्वनि करती पल-पल मेरा उपहास;
मेरी पदध्वनि में होता नित औरों का आभास;
नहीं मुझसे मेरी पहचान !
दुख में जाग उठा अपनेपन का सोता संसार;
सुख में सोई री प्रिय-सुधि की अस्फुट सी झंकार;
हो गये सुखदुख एक समान !

बिन्दु बिन्दु ढुलने से भरता उर में सिन्धु महान;
तिल तिल मिटने से होता है चिर जीवन निर्माण;
न सुलझी यह उलझन नादान !

पल पल के झरने से बनता युग का अद्भुत हार;
श्वास श्वास खोकर जग करता नित दिव से व्यापार;
यही अभिशाप यही वरदान !

इस पथ का कण कण आकर्षण, तृण तृण में अपनाव;
उसमें मूक पहेली है पर इसमें अमिट दुराव;
ह्रदय को बन्धन में अभिमान !
दूर घर मैं पथ से अनजान !

 

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