निशा निमन्त्रण -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 9

निशा निमन्त्रण -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 9

स्वप्न था मेरा भयंकर

स्वप्न था मेरा भयंकर!

रात का-सा था अंधेरा,
बादलों का था न डेरा,
किन्तु फिर भी चन्द्र-तारों से हुआ था हीन अम्बर!
स्वप्न था मेरा भयंकर!

क्षीण सरिता बह रही थी,
कूल से यह कह रही थी-
शीघ्र ही मैं सूखने को, भेंट ले मुझको हृदय भर!
स्वप्न था मेरा भयंकर!

धार से कुछ फासले पर
सिर कफ़न की ओढ चादर
एक मुर्दा गा रहा था बैठकर जलती चिता पर!
स्वप्न था मेरा भयंकर!

हूँ जैसा तुमने कर डाला

हूँ जैसा तुमने कर डाला!

पूण्य किया, पापों में डूबा,
सुख से ऊबा, दुख से ऊबा,
हमसे यह सब करा तुम्हीं ने अपना कोई अर्थ निकाला!
हूँ जैसा तुमने कर डाला!

क्षय मेरा निर्माण जगत का
लय मेरा उत्थान जगत का
जग की ओर हमारा तुमने जोड़ दिया संबंध निराला!
हूँ जैसा तुमने कर डाला!

पूछा जब, ’क्या जीवन जग में?’
कभी चहककर किसी विहग में!
कभी किसी तरु में कर ’मरमर’प्रश्न हमारा तुमने टाला!
हूँ जैसा तुमने कर डाला!

 मैं गाता, शून्य सुना करता

मैं गाता, शून्य सुना करता!

इसको अपना सौभाग्य कहूँ,
अथवा दुर्भाग्य इसे समझूँ,
वह प्राप्त हुआ बन चिर-संगी जिससे था मैं पहले डरता!
मैं गाता, शून्य सुना करता!

जब सबने मुझको छोड़ दिया,
जब सबने नाता तोड़ लिया,
यह पास चला मेरे आया सब रिक्त-स्थानों को भरता!
मैं गाता, शून्य सुना करता!

मेरे मन की दुर्बलता पर–
मेरी मानी मानवता पर–
हँसता तो है यह शून्य नहीं, यदि इस पर सिर न धुना करता!
मैं गाता, शून्य सुना करता!

मधुप, नहीं अब मधुवन तेरा

मधुप, नहीं अब मधुवन तेरा!

तेरे साथ खिली जो कलियाँ,
रूप-रंगमय कुसुमावलियाँ,
वे कब की धरती में सोईं, होगा उनका फिर न सवेरा!
मधुप, नहीं अब मधुवन तेरा!

नूतन मुकुलित कलिकाओं पर,
उपवन की नव आशाओं पर,
नहीं सोहता, पागल, तेरा दुर्बल-दीन-अंगमल फेरा!
मधुप, नहीं अब मधुवन तेरा!

जहाँ प्‍यार बरसा था तुझ पर,
वहाँ दया की भिक्षा लेकर,
जीने की लज्‍जा को कैसे सहता है, मानी, मन तेरा!
मधुप, नहीं अब मधुवन तेरा!

आओ, हम पथ से हट जाएँ

आओ, हम पथ से हट जाएँ!

युवती और युवक मदमाते,
उत्‍सव आज मनाने आते,
लिए नयन में स्‍वप्‍न, वचन में हर्ष, हृदय में अभिलाषाएँ!
आओ, हम पथ से हट जाएँ!

इनकी इन मधुमय घडि‍यों में,
हास-लास की फुलझड़ियों में,
हम न अमंगल शब्‍द निकालें, हम न अमंगल अश्रु बहाएँ!
आओ, हम पथ से हट जाएँ!

यदि‍ इनका सुख सपना टूटे,
काल इन्‍हें भी हम-सा लूटे,
धैर्य बंधाएँ इनके उर को हम पथिको की करुण कथाएँ!
आओ, हम पथ से हट जाएँ!

क्‍या कंकड़-पत्‍थर चुन लाऊँ

क्‍या कंकड़-पत्‍थर चुन लाऊँ?

यौवन के उजड़े प्रदेश के,
इस उर के ध्‍वंसावशेष के,
भग्‍न शिला-खंडों से क्‍या मैं फिर आशा की भीत उठाऊँ?
क्‍या कंकड़-पत्‍थर चुन लाऊँ?

स्‍वप्‍नों के इस रंगमहल में,
हँसूँ निशा की चहल पहल में?
या इस खंडहर की समाधि पर बैठ रुदन को गीत बनाऊँ?
क्‍या कंकड़-पत्‍थर चुन लाऊँ?

इसमें करुण स्‍मृतियाँ सोईं,
इसमें मेरी निधियाँ सोईं,
इसका नाम-निशान मिटाऊँ या मैं इस पर दीप जलाऊँ?
क्‍या कंकड़-पत्‍थर चुन लाऊँ?

किस कर में यह वीणा धर दूँ

किस कर में यह वीणा धर दूँ?

देवों ने था जिसे बनाया,
देवों ने था जिसे बजाया,
मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ?
किस कर में यह वीणा धर दूँ?

इसने स्‍वर्ग रिझाना सीखा,
स्‍वर्गिक तान सुनाना सीखा,
जगती को खुश करनेवाले स्‍वर से कैसे इसको भर दूँ?
किस कर में यह वीणा धर दूँ?

क्‍यों बाक़ी अभिलाषा मन में,
झंकृत हो यह फिर जीवन में?
क्‍यों न हृदय निर्मम हो कहता अंगारे अब धर इस पर दूँ?
किस कर में यह वीणा धर दूँ?

फिर भी जीवन की अभिलाषा

फिर भी जीवन की अभिलाषा!

दुर्दिन की दुर्भाग्य निशा में,
लीन हुए अज्ञात दिशा में
साथी जो समझा करते थे मेरे पागल मन की भाषा!
फिर भी जीवन की अभिलाषा!

सुखी किरण दिन की जो खोई,
मिली न सपनों में भी कोई,
फिर प्रभात होगा, इसकी भी रही नहीं प्राची से आशा!
फिर भी जीवन की अभिलाषा!

शून्य प्रतीक्षा में है मेरी,
गिनती के क्षण की है देरी,
अंधकार में समा जाएगा संसृति का सब खेल-तमाशा!
फिर भी जीवन की अभिलाषा!

 जग ने तुझे निराश किया

जग ने तुझे निराश किया!

डूब-डूबकर मन के अंदर
लाया तू निज भावों का स्वर,
कभी न उनकी सच्चाई पर जगती ने विश्वास किया!
जग ने तुझे निराश किया!

तूने अपनी प्यास बताई,
जग ने समझा तू मधुपायी,
सौरभ समझा, जिसको तूने कहकर निज उच्छवास दिया!
जग ने तुझे निराश किया!

पूछा, निज रोदन में सकरुण
तूने दिखलाए क्या-क्या गुण?
कविता कहकर जग ने तेरे क्रंदन का उपहास किया!
जग ने तुझे निराश किया!

 सचमुच तेरी बड़ी निराशा

सचमुच तेरी बड़ी निराशा!

जल की धार पड़ी दिखलाई,
जिसने तेरी प्यास बढाई,
मरुथल के मृगजल के पीछे दौड़ मिटी सब तेरी आशा!
सचमुच तेरी बड़ी निराशा!

तूने समझा देव मनुज है,
पाया तूने मनुज दनुज है,
बाध्य घृणा करने को यों है पूजा करने की अभिलाषा!
सचमुच तेरी बड़ी निराशा!

समझा तूने प्यार अमर है,
तूने पाया वह नश्वर है,
छोटे से जीवन से की है तूने बड़ी-बड़ी प्रत्याशा!
सचमुच तेरी बड़ी निराशा!

क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं

क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

अगणित उन्‍मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी घड़ियों को किन-किन से आबाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

याद सुखों की आँसू लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

दोनों करके पछताता हूँ,
सोच नहीं, पर, मैं पाता हूँ,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आज़ाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

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