निशा निमन्त्रण -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 6

निशा निमन्त्रण -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 6

साथी, कर न आज दुराव

साथी, कर न आज दुराव!

खींच ऊपर को भ्रुओं को
रोक मत अब आँसुओं को,
सह सकेगी भार कितना यह नयन की नाव!
साथी, कर न आज दुराव!

व्यक्त कर दे अश्रु कण से,
आह से, अस्फुट वचन से,
प्राण तन-मन को दबाए जो हृदय के भाव!
साथी, कर न आज दुराव!

रो रही बुलबुल विकल हो
इस निशा में धैर्य धन खो,
वह कहीं समझे न उसके ही हृदय में घाव!
साथी, कर न आज दुराव!

 हम कब अपनी बात छिपाते

हम कब अपनी बात छिपाते?

हम अपना जीवन अंकित कर
फेंक चुके हैं राज मार्ग पर,
जिसके जी में आए पढ़ले थमकर पलभर आते जाते!
हम कब अपनी बात छिपाते?

हम सब कुछ करके भी मानव,
हमीं देवता, हम ही दानव,
हमीं स्वर्ग की, हमीं नरक की, क्षण भर में सीमा छू आते!
हम कब अपनी बात छिपाते?

मानवता के विस्तृत उर हम,
मानवता के स्वच्छ मुकुर हम,
मानव क्यों अपनी मानवता बिंबित हममें देख लजाते!
हम कब अपनी बात छिपाते?

हम आँसू की धार बहाते

हम आँसू की धार बहाते!

मानव के दुख का सागर जल
हम पी लेते बनकर बादल,
रोकर बरसाते हैं, फिर भी हम खारे को मधुर बनाते!
हम आँसू की धार बहाते!

उर मथकर कंठों तक आता,
कंठ रुँधा पाकर फिर जाता,
कितने ऐसे विष का दर्शन, हाय, नहीं मानव कर पाते!
हम आँसू की धार बहाते!

मिट जाते हम करके वितरण
अपना अमृत सरीखा सब धन!
फिर भी ऐसे बहुत पड़े जो मेरा तेरा भाग्य सिहाते!
हम आँसू की धार बहाते!

 क्यों रोता है जड़ तकियों पर

क्यों रोता है जड़ तकियों पर!

जिनका उर था स्नेह विनिर्मित,
भाव सरसता से अभिसिंचित,
जब न पसीजे इनसे वे भी, आज पसीजेगें क्या पत्थर!
क्यों रोता है जड़ तकियों पर!

इनमें मानव का जीवन है,
जीवन का नीरव क्रंदन है,
नष्ट न कर तू इन बूँदों को मरुथल के ऊपर बरसाकर!
क्यों रोता है जड़ तकियों पर!

रो तू अक्षर-अक्षर में ही,
रो तू गीतों के स्वर में ही,
शांत किसी दुखिया का मन हो जिनको सूनेपन में गाकर!
क्यों रोता है जड़ तकियों पर!

मैंने दुर्दिन में गाया है

मैंने दुर्दिन में गाया है!

दुर्दिन जिसके आगे रोता,
बंदी सा नतमस्तक होता,
एक न एक समय दुनिया का एक-एक प्राणी आया है!
मैंने दुर्दिन में गाया है!

जीवन का क्या भेद बताऊँ,
जगती का क्या मर्म जताऊँ,
किसी तरह रो-गाकर मैंने अपने मन को बहलाया है!
मैंने दुर्दिन में गाया है!

साथी, हाथ पकड़ मत मेरा,
कोई और सहारा तेरा,
यही बहुत, दुख दुर्बल तूने मुझको अपने सा पाया है!
मैंने दुर्दिन में गाया है!

साथी, कवि नयनों का पानी

साथी, कवि नयनों का पानी-

चढ जाए मंदिर प्रतिमा पर,
यी दे मस्जिद की गागर भर,
या धोए वह रक्त सना है जिससे जग का आहत प्राणी?
साथी, कवि नयनों का पानी-

लिखे कथाएँ राज-काज की,
या परिवर्तित जन समाज की,
या मानवता के विषाद की लिखे अनादि-अनंत कहानी?
साथी, कवि नयनों का पानी-

’कल-कल’ करे सरित निर्झर में,
या मुखरित हो सिन्धु लहर में,
युग वाणी बोले या बोले वह, जो है युग-युग की वाणी?
साथी, कवि नयनों का पानी-

जग बदलेगा, किंतु न जीवन

जग बदलेगा, किंतु न जीवन!

क्या न करेंगे उर में क्रंदन
मरण-जन्म के प्रश्न चिरंतन,
हल कर लेंगे जब रोटी का मसला जगती के नेतागण?
जग बदलेगा, किंतु न जीवन!

प्रणय-स्वप्न की चंचलता पर
जो रोएँगे सिर धुन-धुनकर,
नेताओं के तर्क वचन क्या उनको दे देंगे आश्वासन?
जग बदलेगा, किंतु न जीवन!

मानव-भाग्य-पटल पर अंकित
न्याय नियति का जो चिर निश्चित,
धो पाएँगें उसे तनिक भी नेताओं के आँसू के कण?
जग बदलेगा, किंतु न जीवन!

क्षण भर को क्यों प्यार किया था

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

‘यह अधिकार कहाँ से लाया?’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

आज सुखी मैं कितनी, प्यारे

‘आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’

चिर अतीत में ‘आज’ समाया,
उस दिन का सब साज समाया,
किंतु प्रतिक्षण गूँज रहे हैं नभ में वे कुछ शब्द तुम्हारे!
‘आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’

लहरों में मचला यौवन था,
तुम थीं, मैं था, जग निर्जन था,
सागर में हम कूद पड़े थे भूल जगत के कूल किनारे!
‘आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’

साँसों में अटका जीवन है,
जीवन में एकाकीपन है,
‘सागर की बस याद दिलाते नयनों में दो जल-कण खारे!’

‘आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’

सोच सुखी मेरी छाती है

सोच सुखी मेरी छाती है—
दूर कहाँ मुझसे जाएगी,
कैसे मुझको बिसराएगी?
मेरे ही उर की मदिरा से तो, प्रेयसि, तू मदमाती है!
सोच सुखी मेरी छाती है—

मैंने कैसे तुझे गँवाया,
जब तुझको अपने में पाया?
पास रहे तू कहीं किसी के, सुरक्षित मेरी थाती है!
सोच सुखी मेरी छाती है—

तू जिसको कर प्यार, वही मैं!
अपनेमें ही आज नहीं मैं!
किसी मूर्ति पर पुष्प चढ़ा तू पूजा मेरी हो जाती है!
सोच सुखी मेरी छाती है—

 जग-का मेरा प्यार नहीं था

जग-का मेरा प्यार नहीं था!

तूने था जिसको लौटाया,
क्या उसको मैंने फिर पाया?
हृदय गया था अर्पित होने, साधारण उपहार नहीं था!
जग-का मेरा प्यार नहीं था!

सीमित जग से सीमित क्षण में
सीमाहीन तृषा थी मन में,
तुझमें अपना लय चाहा था, हेय प्रणय अभिसार नहीं था!
जग-का मेरा प्यार नहीं था!

स्वर्ग न जिसको छू पाया था,
तेरे चरणों में आया था,
तूने इसका मूल्य न समझा, जीवन था, खिलवार नहीं था!
जग-का मेरा प्यार नहीं था!

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