निशा निमन्त्रण -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 5

निशा निमन्त्रण -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 5

आज मुझसे बोल, बादल

आज मुझसे बोल, बादल!

तम भरा तू, तम भरा मैं,
गम भरा तू, गम भरा मैं,
आज तू अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

आग तुझमें, आग मुझमें,
राग तुझमें, राग मुझमें,
आ मिलें हम आज अपने द्वार उर के खोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

भेद यह मत देख दो पल–
क्षार जल मैं, तू मधुर जल,
व्यर्थ मेरे अश्रु, तेरी बूँद है अनमोल बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

आज रोती रात, साथी

आज रोती रात, साथी!

घन तिमिर में मुख छिपाकर
है गिराती अश्रु झर-झर,
क्या लगी कोई हृदय में तारकों की बात, साथी!
आज रोती रात, साथी!

जब तड़ित क्रंदन श्रवणकर
काँपती है धरणि थर थर,
सोच, बादल के हृदय ने क्या सहे आघात, साथी!
आज रोती रात, साथी!

एक उर में आह ’उठती,
निखिल सृष्टि कराह उठती,
रात रोती, भीग उठता भूमि का पट गात, साथी!
आज रोती रात, साथी!

 रात-रात भर श्वान भूकते

रात-रात भर श्वान भूकते।

पार नदी के जब ध्वनि जाती,
लौट उधर से प्रतिध्वनि आती
समझ खड़े समबल प्रतिद्वदी दे-दे अपने प्राण भूकते।
रात-रात भर श्वान भूकते।

इस रव से निशि कितनी विह्वल,
बतला सकता हूँ मैं केवल,
इसी तरह मेरे उर में भी असंतुष्ट अरमान भूकते।
रात-रात भर श्वान भूकते!

जब दिन होता ये चुप होते,
कहीं अँधेरे में छिप सोते,
पर दिन रात हृदय के मेरे ये निर्दय मेहमान भूकते।
रात-रात भर श्वान भूकते!

रो, अशकुन बतलाने वाली

रो, अशकुन बतलाने वाली!

‘आउ-आउ’ कर किसे बुलाती?
तुझको किसकी याद सताती?
मेरे किन दुर्भाग्य क्षणों से प्यार तुझे, ओ तम सी काली?
रो, अशकुन बतलाने वाली!
देख किसी को अश्रु बहाते,
नेत्र सदा साथी बन जाते,
पर तेरी यह चीखें उर में कितना भय उपजानेवाली?
रो, अशकुन बतलाने वाली!

सत्य मिटा, सपना भी टूटा,
संगिन छूटी, संगी छूटा,
कौन शेष रह गई आपदा जो तू मुझ पर लानेवाली?
रो, अशकुन बतलाने वाली!

साथी, नया वर्ष आया है

साथी, नया वर्ष आया है!

वर्ष पुराना, ले, अब जाता,
कुछ प्रसन्न सा, कुछ पछताता
दे जी भर आशीष, बहुत ही इससे तूने दुख पाया है!
साथी, नया वर्ष आया है!

उठ इसका स्वागत करने को,
स्नेह बाहुओं में भरने को,
नए साल के लिए, देख, यह नई वेदनाएँ लाया है!
साथी, नया वर्ष आया है!

उठ, ओ पीड़ा के मतवाले!
ले ये तीक्ष्ण-तिक्त-कटु प्याले,
ऐसे ही प्यालों का गुण तो तूने जीवन भर गाया है!
साथी, नया वर्ष आया है!

आओ, नूतन वर्ष मना लें

आओ, नूतन वर्ष मना लें!

गृह-विहीन बन वन-प्रयास का
तप्त आँसुओं, तप्त श्वास का,
एक और युग बीत रहा है, आओ इस पर हर्ष मना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

उठो, मिटा दें आशाओं को,
दबी छिपी अभिलाषाओं को,
आओ, निर्ममता से उर में यह अंतिम संघर्ष मना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

हुई बहुत दिन खेल मिचौनी,
बात यही थी निश्चित होनी,
आओ, सदा दुखी रहने का जीवन में आदर्श बना लें!
आओ, नूतन वर्ष मना लें!

रात आधी हो गई है

रात आधी हो गई है!

जागता मैं आँख फाड़े,
हाय, सुधियों के सहारे,
जब कि दुनिया स्‍वप्‍न के जादू-भवन में खो गई है!
रात आधी हो गई है!

सुन रहा हूँ, शांति इतनी,
है टपकती बूंद जितनी
ओस की, जिनसे द्रुमों का गात रात भिगो गई है?
रात आधी हो गई है!

दे रही कितना दिलासा,
आ झरोखे से ज़रा-सा,
चाँदनी पिछले पहर की पास में जो सो गई है!
रात आधी हो गई है!

विश्व मनाएगा कल होली

विश्व मनाएगा कल होली!

घूमेगा जग राह-राह में
आलिंगन की मधुर चाह में,
स्नेह सरसता से घट भरकर, ले अनुराग राग की झोली!
विश्व मनाएगा कल होली!
उर से कुछ उच्छवास उठेंगे,
चिर भूखे भुज पाश उठेंगे,
कंठों में आ रुक जाएगी मेरे करुण प्रणय की बोली!
विश्व मनाएगा कल होली!

आँसू की दो धार बहेगी,
दो-दो मुट्ठी राख उड़ेगी,
और अधिक चमकीला होगा जग का रंग, जगत की रोली!
विश्व मनाएगा कल होली!

 खेल चुके हम फाग समय से

खेल चुके हम फाग समय से!

फैलाकर निःसीम भुजाएँ,
अंक भरीं हमने विपदाएँ,
होली ही हम रहे मनाते प्रतिदिन अपने यौवन वय से!
खेल चुके हम फाग समय से!

मन दे दाग अमिट बतलाते,
हम थे कैसा रंग बहाते
मलते थे रोली मस्तक पर क्षार उठाकर दग्ध हृदय से!
खेल चुके हम फाग समय से!

रंग छुड़ाना, चंग बजाना,
रोली मलना, होली गाना–
आज हमें यह सब लगते हैं केवल बच्चों के अभिनय से!
खेल चुके हम फाग समय से!

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