निर्मला की पाती-प्यार पनघटों को दे दूंगा -शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

निर्मला की पाती-प्यार पनघटों को दे दूंगा -शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

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मैं भी एक कली थी; लेकिन, खिलने से पहले मुरझाई।
ऐसी हीर कनी थी जिसका जौहरियों ने मोल न जाना।।
कुछ दिन दे दुलार की छाया, मनमौजी ख़ुशियाँ शरमाईं।
ऐसे दिन आए जिनका था, करतब रोना और रुलाना।।
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श्यामल-वर्ण, झुर्रियाँ सौ-सौ तन पर, आँखों में नीरवता।
बाँहों में पौरुष, ललाट पर तेज, साधना में तन्मयता।।
व्यवहारों में निश्छल; लेकिन दरिद्रता से तापित-शापित।
मेरा माली पिता सींच कर, मुझे नित्य पाला करता था।।
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एक दिवस नभ पर बादल थे, धरती पर था घना अँधेरा।
हल्क़ी चीख़ मिल गई रिमझिम बूँदों के संगीत-स्वरों में।।
उलझ गए थे प्राण पवन से, मेरे बूढ़े विकल पिता के।
दीप वासना के जलते थे, यौवन के बदनाम घरों में।।
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पता नहीं कब बेहोशी में, कौन बना मेरा व्यापारी?
बग़िया से उठ कर कब, कैसे, शीशमहल की हुई बन्दिनी?
जहाँ लाज लुटती अबला की, बेबस आँसू की छाती पर।
अपने ही पड़ोस के भैया राजू की बन गई संगिनी।।
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फिर तो मेरे लुटने की भी राम-कहानी सी चल बैठी।
मुझ पर थूक दिया लोगों ने; लेकिन अपना पाप न देखा।।
जीवन-दीप आँसुओं से ही जलना था, सो जला रही हूँ।
तुमसे क्या कहना, अपने ही माथे की टेढ़ी हैं रेखा।।
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पहले एक अश्रु-कण मेरा, पाहन तक पिघला देता था।
आज उसी का सागर मेरी खोई आँखों में बंदी है।।
मैं पावन अतीत की तुमको, कैसे कहो सफ़ाई दूँगी?
न्यायाधीष वही हैं, जिनकी आँखें ज्योति-हीन, अंधी हैं।।
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मेरे गुण देख कर दिया था, माँ ने मुझ को नाम ‘निर्मला’;
लेकिन तेरे दृष्टि-पत्र पर केवल ‘रूपवती बाई’ हूँ।।
आज देख! जाती बिरियाँ तक बहुत सह चुकी हूँ बदनामी।
स्वीकारो, तुमको देने को सच की डलिया भर लाई हूँ।।
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पहले कभी पुण्य का मन्दिर, मेरा भी था एक घराना।
अब समाज की अमिट कालिमा, लाख धुलूँ पर धुल न सकूँगी।
मचल रहीं हैं बह जाने को नीर-क्षीर की दो सरिताएँ।
लाख ओंठ सीं लो; लेकिन मैं सच कहने से नहीं रुकूँगी।।
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मुझ पर अनायास ही ढेरों माँटी सहज फेंकने वालो-
अपने ही यथार्थ को देखो, सोचो तो पहले, तुम क्या हो?
वही न, जिसका एक-एक कण पुता हुआ उजली कीचड़ से?
कोई पाप झूठ में छिप कर, पावनता के घर आया हो।।
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कहता हुआ-‘देख तो तेरा अंचल कितना मलिन हो गया?’
जैसे-किसी इन्दु पर तम की छाया ने उपहास कर दिया।।
कोई पतित आचरण कह दे-‘मैं सतवंती का चरित्र हूँ’।
अथवा किसी रोग ने अपनी काया का विश्वास कर लिया।।
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मैं हूँ निठुर झूठ की ज़ंजीरों में जकड़ी विवश सचाई।
तुम हो असत् सत्य से आवृत अन आवृत झूठ की गहनता।।
मेरे विमल जागरण के घर सोती है मेरी मजबूरी।
मेरे मुक्ति-यत्न से लिपटी, पौरुष-तिरस्कृता निष्फलता।।
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ओ समाज के सत्य! पता है तू है वह अक्षम्य अपराधी-
जिस पर है अभियोग किसी भी माँ की ममता की हत्या का।
किसी दुलहिनी की कलियों-सी, कोमल साधों के हत्यारे-
तुमने कलाकार का जीवन, बना दिया बन्दी मिथ्या का।।
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तुम हो ऐसे पंछी जिसके पंख कटे, पर पंथ न भूला।
दिन भर रहे स्वतंत्र, रात भर दीप-शिखा का बने पतंगा।।
दिन-रातों के साथ बदलते पाप-पुण्य की भी परिभाषा।
दिन का धर्म नाच करता है, मेरे घर आ कर अधनंगा।।
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मैं दर-दर पर गई, मुक्ति पा, बिना भीख वापस घर आई।
कोई पौरुष दिखा न तत्पर, मुझ को गले लगा लेने को।।
पहले जो पौरुष, अबला की लाज बचा कर ही पौरुष था-
वही आज आतुर नारी की अस्मत स्वयं मिटा देने को।।
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तुम हो ऐसे भाँड़े जिस पर चिकनाई की कमी नहीं है।
लाख बहे गंगा का पानी, कण भी ठहर नहीं पाएगा।।
समझ रही हूँ सब कुछ फिर भी, चेतावनी तुम्हें देती हूँ।
अब पद-दलित किसी नारी का, रूप नाग सा डँस जाएगा।।
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मेरे सिरजनहार तुम्हीं हो, अनावरित तन के अधिकारी।
तुमने ही लाखों कुटियों के दीप बुझाए हैं हँस-हँस कर।।
अपने घर कुबेर, पर मेरे द्वारे पर जनम के भिखारी।
तुमको है धिक्कार! आज अभिशाप दे रही हूँ रो-धो कर।।

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तुम युग के इतिहास बदल जाने पर भी संतप्त रहोगे।
अंतर्द्वंद्व प्रपीड़ित तन पर संघर्षों के घाव रहेंगे।।
प्रकृति महाकाली के कर की; नारी ही करवाल बनेगी।
कुछ विध्वंस-प्रयोजक तुम में से ही उस पर धार धरेंगे।।

-13 मार्च, 1963

 

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