निधरक भई, अनुगवति है नंद घर-आलम शेख -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Aalam Sheikh

निधरक भई, अनुगवति है नंद घर-आलम शेख -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Aalam Sheikh

निधरक भई, अनुगवति है नंद घर,
और ठौर कँ, टोहे न अहटाति है ।
पौरि पाखे पिछवारे, कौरे-कौरे लागी रहै,
ऑंगन देहली, याहि बीच मँडराति है ।
हरि-रस-राती, ‘सेख’ नैकँ न होइ हाती,
प्रेम मद-माती, न गनति दिन-राति है ।
जब-जब आवति है, तब कछू भूलि जाति,
भूल्यो लेन आवति है और भूलि जाति है ।

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