निगल गए सब की सब समुंदर, ज़मीं बची अब कहीं नहीं है-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

निगल गए सब की सब समुंदर, ज़मीं बची अब कहीं नहीं है-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

निगल गए सब की सब समुंदर, ज़मीं बची अब कहीं नहीं है
बचाते हम अपनी जान जिसमें वो कश्ती भी अब कहीं नहीं है

बहुत दिनों बाद पाई फ़ुर्सत तो मैंने ख़ुद को पलटके देखा
मगर मैं पहचानता था जिसको वो आदमी अब कहीं नहीं है

गुज़र गया वक़्त दिल पे लिखकर न जाने कैसी अजीब बातें
वरक़ पलटता हूँ मैं जो दिल के तो सादगी अब कहीं नहीं है

वो आग बरसी है दोपहर में कि सारे मंज़र झुलस गए हैं
यहाँ सवेरे जो ताज़गी थी वो ताज़गी अब कहीं नहीं है

तुम अपने क़स्बों में जाके देखो वहाँ भी अब शहर ही बसे हैं
कि ढूँढते हो जो ज़िंदगी तुम वो ज़िंदगी अब कहीं नहीं है

Leave a Reply