नाराज़ -राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 5

नाराज़ -राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 5

तो क्या बारिश भी ज़हरीली हुई है

तो क्या बारिश भी ज़हरीली हुई है
हमारी फ़स्ल क्यों नीली हुई है

ये किसने बाल खोले मौसमों के
हवा क्यों इतनी बर्फ़ीली हुई है

किसी दिन पूछिये सूरजमुखी से
कि रंगत किसलिये पीली हुई है

सफ़र का लुत्फ़ बढ़ता जा रहा है
ज़मीं कुछ और पथरीली हुई है

सुनहरी लग रहा है एक-एक पल
कई सदियों में तबदीली हुई है

दिखाया है अगर सूरज ने गुस्सा
तो बालू और चमकीली हुई है

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

अँधेरे चारों तरफ़ सांय-सांय करने लगे

अँधेरे चारों तरफ़ सांय-सांय करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे

ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे कांय-कांय करने लगे

तेरा मेरा नाम ख़बर में रहता था

तेरा मेरा नाम ख़बर में रहता था
दिन बीते, एक सौदा सर में रहता था

मेरा रस्ता तकता था एक चांद कहीं
मैं सूरज के साथ सफ़र में रहता था

सारे मंज़र गोरे-गोरे लगते थे
जाने किस का रूप नज़र में रहता था

मैंने अक्सर आंखें मूंद के देखा है
एक मंज़र जो पस-मंज़र म रहता था

काठ की कश्ती पीठ थपकती रहती थी
दरियाओं का पांव भंवर में रहता था

उजली उजली तस्वीरें सी बनती हैं
सुनते हैं अल्लाह बशर में रहता था

मीलों तक हम चिड़ियों से उड़ जाते थे
कोई मेरे साथ सफ़र में रहता था

सुस्ताती है गर्मी जिस के साये में
ये पौधा कल धूप नगर में रहता था

धरती से जब खुद को जोड़े रहते थे
ये सारा आकाश असर में रहता था

सच का बोझ उठाये हूँ अब पलकों पर
पहले मैं भी ख़्वाब नगर में रहता था

नींदें क्या-क्या ख़्वाब दिखाकर ग़ायब हैं

नींदें क्या-क्या ख़्वाब दिखाकर ग़ायब हैं
आंखें तो मौजूद हैं मंज़र ग़ायब हैं

बाक़ी जितनी चीज़ें थीं मौजूद हैं सब
नक्शे में दो-चार समुन्दर ग़ायब हैं

जाने ये तस्वीर में किसका लश्कर है
हाथों में शमशीरें हैं सर ग़ायब हैं

ग़ालिब भी है बचपन भी है शहरों में
मजनूं भी है लेकिन पत्थर ग़ायब हैं

धन्धेबाज़ मुजावर हाकिम बन बैठे
दरगाहों से मस्त कलन्दर ग़ायब हैं

दरवाज़ों पर दस्तक दें तो कैसे दें
घर वाले मौजूद मगर घर ग़ायब हैं

शाम होती है तो पलकों पे सजाता है मुझे

शाम होती है तो पलकों पे सजाता है मुझे
वह चिराग़ों की तरह रोज़ जलाता है मुझे

मैं हूं ये कम तो नहीं है तेरे होने की दलील
मेरा होना तेरा एहसास दिलाता है मुझे

अब किसी शख़्स में सच सुनने की हिम्मत है कहां
मुश्किलों ही से कोई पास बिठाता है मुझे

कैसे महफ़ूज़ रखूं खुद को अजायब घर में
जो भी आता है यहां हाथ लगाता है मुझे

जाने क्या बनना है तुझको मेरी गीली मिट्टी
कुज़ागर रोज़ बनाता है मिटाता है मुझे

आब-ओ-दाना किसी बिगड़े हुए बच्चे की तरह
मैं जहाँ शाख पे बैठूं के उड़ाता है मुझे

चराग़ों का घराना चल रहा है

चराग़ों का घराना चल रहा है
हवा से दोस्ताना चल रहा है

जवानी की हवाएँ चल रही हैं
बुज़ुर्गों का ख़ज़ाना चल रहा है

मिरी गुम-गश्तगी पर हँसने वालो
मिरे पीछे ज़माना चल रहा है

अभी हम ज़िंदगी से मिल न पाए
तआरुफ़ ग़ाएबाना चल रहा है

नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है

वही दुनिया वही साँसें वही हम
वही सब कुछ पुराना चल रहा है

ज़्यादा क्या तवक़्क़ो हो ग़ज़ल से
मियाँ, बस आब-ओ-दाना चल रहा है

समुंदर से किसी दिन फिर मिलेंगे
अभी पीना-पिलाना चल रहा है

वही महशर वही मिलने का व’अदा
वही बूढ़ा बहाना चल रहा है

यहाँ इक मदरसा होता था पहले
मगर अब कार-ख़ाना चल रहा है

जितना देख आये हैं अच्छा है, यही काफ़ी है

जितना देख आये हैं अच्छा है यही काफ़ी है
अब कहाँ जाइये दुनिया है यही काफ़ी है

हमसे नाराज़ है एक सूरज कि पड़े सोते हो
जाग उठने की तमन्ना है बस यही काफ़ी है

अब ज़रूरी तो नहीं है कि वह फलदार भी हो
शाख से पेड़ का रिश्ता है यही काफ़ी है

लाओ मैं तुमको समुन्दर के इलाके लिख दूं
मेरे हिस्से में ये क़तरा है यही काफ़ी है

गालियों से भी नवाज़े तो करम है उसका
वह मुझे याद तो करता है यही काफ़ी है

अब अगर कम भी जियें हम तो कोई रंज नहीं
हमको जीने का सलीक़ा है यही काफ़ी है

क्या ज़रूरी है कभी तुम से मुलाक़ात भी हो
तुमसे मिलने की तमन्ना है यही काफ़ी है

अब किसी और तमाशे की ज़रूरत क्या है
ये जो दुनिया का तमाशा है यही काफ़ी है

और अब कुछ भी नहीं चाहिये सामाने-सफ़र
पांव है, धूप है, सेहरा है यही काफ़ी है

अब सितारों पे कहां जायें तनाबें लेकर,
ये जो मिट्‌टी का घरौंदा है यही काफ़ी है।

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