नाराज़ -राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 3

नाराज़ -राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 3

काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं

काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं
और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं

आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत
हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं

हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है
हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब करते हैं

देखिए जिस को उसे धुन है मसीहाई की
आज कल शहर के बीमार मतब करते हैं

ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने
बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं

एक-एक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे
उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं

शजर हैं अब समर आसार मेरे

शजर हैं अब समर आसार मेरे
उगे आते हैं दावेदार मेरे

मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे
मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे

यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं
समुंदर हैं समुंदर पार मेरे

अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें
अगर चाहें तो ये बीमार मेरे

हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन
गए बेकार सारे वार मेरे

मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ
यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे

हँसी में टाल देना था मुझे भी
ख़ता क्यूँ हो गए सरकार मेरे

तसव्वुर में न जाने कौन आया
महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे

तुम्हारा नाम दुनिया जानती है
बहुत रुस्वा हैं अब अशआर मेरे

भँवर में रुक गई है नाव मेरी
किनारे रह गए इस पार मेरे

मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ
अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे

यहाँ कब थी जहाँ ले आई दुनिया

यहाँ कब थी जहाँ ले आई दुनिया
यह दुनिया को कहाँ ले आई दुनिया

ज़मीं को आसमानों से मिला कर
ज़मीं पर आसमां ले आई दुनिया

मैं ख़ुद से बात करना चाहता था
ख़ुदा को दरमियां ले आई दुनिया

चिराग़ों की लवें सहमी हुई हैं
सुना है आँधियां ले आई दुनिया

जहां मैं था वहां दुनिया कहां थी
वहां मैं हूँ जहां ले आई दुनिया

तवक़्क़ो हमने की थी शाखे-गुल की
मगर तीरो कमाँ ले आई दुनिया

पुराने शहर के मंज़र निकलने लगते हैं

पुराने शहर के मंज़र निकलने लगते हैं
ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं

मैं खोलता हूँ सदफ़ मोतियों के चक्कर में
मगर यहाँ भी समन्दर निकलने लगते हैं

हसीन लगते हैं जाड़ों में सुबह के मंज़र
सितारे धूप पहन कर निकलने लगते हैं

बुलन्दियों का तसव्वुर भी ख़ूब होता है
कभी-कभी तो मेरे पर निकलने लगते हैं

बुरे दिनों से बचाना मुझे मेरे मौला !
क़रीबी दोस्त भी बच कर निकलने लगते हैं

अगर ख़्याल भी आए कि तुझको ख़त लिक्खूँ
तो घोंसलों से कबूतर निकलने लगते हैं

मेरे मरने की ख़बर है उसको

मेरे मरने की ख़बर है उसको
अपनी रुसवाई का डर है उसको

अब वह पहला सा नज़र आता नहीं
ऐसा लगता है नज़र है उसको

मैं किसी से भी मिलूं कुछ भी करूं
मेरी नीयत की ख़बर है उसको

भूल जाना उसे आसान नहीं
याद रखना भी हुनर है उसको

रोज़ मरने की दुआ मांगता है
जाने किस बात का डर है उसको

मंज़िलें साथ लिये फिरता है
कितना दुशवार सफर है उसको

दांव पर मैं भी, दांव पर तू भी है

दांव पर मैं भी, दांव पर तू भी है
बेख़बर मैं भी, बेख़बर तू भी

आस्मां ! मुझसे दोस्ती करले
दरबदर मैं भी, दरबदर तू भी

कुछ दिनों शहर की हवा खा ले
सीख जायेगा सब हुनर तू भी

मैं तेरे साथ, तू किसी के साथ
हमसफ़र मैं भी हमसफ़र तू भी

हैं वफ़ाओं के दोनों दावेदार
मैं भी इस पुलसिरात पर, तू भी

ऐ मेरे दोसत ! तेरे बारे में
कुछ अलग राय थी मगर, तू भी

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते
जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते

अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते

रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना
हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते

मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद
लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते

अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के
जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते

हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था
तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते

हंसते रहते हैं मुसल्सल हम तुम

हंसते रहते हैं मुसल्सल हम तुम
हों ना जायें कहीं पागल हम तुम

जैसे दरिया किसी दरिया से मिले
आओ! हो जाएँ मुकम्मल हम तुम

उड़ती फिरती है हवाओं में ज़मीं
रेंगते फिरते हैं पैदल हम तुम

प्यास सदियों की लिए आँखों में
देखते रहते हैं बादल हम तुम

धूप हमने ही उगाई है यहां
हैं इसी राह का पीपल हम तुम

शहर की हद ही नहीं आती है
काटते रहते हैं जंगल हम तुम

उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो

उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो

ज़िन्दगी क्या है खुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगें उड़ाया करो

दोस्तों से मुलाक़ात के नाम पर
नीम की पत्तियों को चबाया करो

शाम के बाद जब तुम सहर देख लो
कुछ फ़क़ीरों को खाना खिलाया करो

अपने सीने में दो गज़ ज़मीं बाँधकर
आसमानों का ज़र्फ़ आज़माया करो

चाँद सूरज कहाँ, अपनी मंज़िल कहाँ
ऐसे वैसों को मुँह मत लगाया करो

 

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