नाराज़ -राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 1

नाराज़ -राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 1

पाँव से आसमान लिपटा है

पाँव से आसमान लिपटा है
रास्तों से मकान लिपटा है

रौशनी है तेरे ख़यालों की
मुझसे रेशम का थान लिपटा है

कर गये सब किनारा कश्ती से
सिर्फ़ इक बादवन लिपटा है

दे तवानाईयां मेरे माबूद !
जिस्म से ख़ानदान लिपटा है

और मैं सुन रहा हूँ क्या-क्या कुछ
मुझसे एक बेजुबान लिपटा है

सारी दुनिया बुला रही है मगर
मुझसे हिन्दोस्तान लिपटा है

नज़ारा देखिये कलियों के फूल होने का

नज़ारा देखिये कलियों के फूल होने का
यही है वक्त दुआएं क़बूल होने का

उन्हें बताओ के ये रास्ते सलीब के हैं
जो लोग करते हैं दावा रसूल होने का

तमाम उम्र गुज़रने के बाद दुनिया में
पता चला हमें अपने फुजूल होने का

उसूल वाले हैं बेचारे इन फ़रिश्तों ने
मज़ा चखा ही नहीं बे उसूल होने का

है आसमां से बुलन्द उसका मर्तबा जिसको
शर्फ़ है आप के कदमों की धूल होने का

चलो फ़लक पे कहीं मन्ज़िलें तलाश करें
ज़मीं पे कुछ नहीं हासिल हसूल होने का

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए
कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए

सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़
सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए

मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था
हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए

नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र
आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए

सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार
आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए

अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर
मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए

ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी

ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी
हम न होंगे तो ये दुनिया दर-ब-दर हो जाएगी

पाँव पत्थर कर के छोड़ेगी अगर रुक जाइए
चलते रहिए तो ज़मीं भी हम-सफ़र हो जाएगी

जुगनुओं को साथ ले कर रात रौशन कीजिए
रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी

ज़िंदगी भी काश मेरे साथ रहती उम्र-भर
ख़ैर अब जैसे भी होनी है बसर हो जाएगी

तुम ने ख़ुद ही सर चढ़ाई थी सो अब चक्खो मज़ा
मैं न कहता था कि दुनिया दर्द-ए-सर हो जाएगी

तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं ज़िंदगी के वास्ते
इतना मीठा बन के मत रहिए शकर हो जाएगी

सर पर बोझ अँधियारों का है मौला ख़ैर

सर पर बोझ अँधियारों का है मौला ख़ैर
और सफ़र कुहसारों का है मौला ख़ैर

दुश्मन से तो टक्कर ली है सौ-सौ बार
सामना अबके यारों का है मौला ख़ैर

इस दुनिया में तेरे बाद मेरे सर पर
साया रिश्तेदारों का है मौला ख़ैर

दुनिया से बाहर भी निकलकर देख चुके
सब कुछ दुनियादारों का है मौला ख़ैर

और क़यामत मेरे चराग़ों पर टूटी
झगड़ा चाँद-सितारों का है मौला ख़ैर

लिख रहा है हुजरा पीर फ़क़ीरों का
और मंजर दरबारों का है मौला ख़ैर

चौराहों पर वर्दी वाले आ पहुंचे
मौसम फिर त्यौहारों का है मौला ख़ैर

एक ख़ुदा है, एक पयम्बर, एक किताब
झगड़ा तो दस्तारों का है मौला ख़ैर

वक़्त मिला तो मसजिद भी हो आएंगे
बाक़ी काम मज़ारों का है मौला ख़ैर

मैंने ‘अलिफ़’ से ‘ये’ तक ख़ुशबू बिखरा दी
लेकिन गांव गंवारों का है मौला ख़ैर

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं

नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है
ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं

रोज़ हम इस अँधेरी धुँध के पार
क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं

धूप इतनी कराहती क्यों है
छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं

टकटकी बाँध ली है आँखों ने
रास्ते वापसी के देखते हैं

बारिशों से तो प्यास बुझती नहीं
आइए ज़हर पी के देखते हैं

मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है

मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है
वो एक मौज जो दरिया के पार रहती है

हमारे ताक़ भी बे-ज़ार हैं उजालों से
दिए की लौ भी हवा पर सवार रहती है

फिर उस के बा’द वही बासी मंज़रों के जुलूस
बहार चंद ही लम्हे बहार रहती है

इसी से क़र्ज़ चुकाए हैं मैं ने सदियों के
ये ज़िंदगी जो हमेशा उधार रहती है

हमारी शहर के दानिशवरों से यारी है
इसी लिए तो क़बा तार तार रहती है

मुझे ख़रीदने वालो ! क़तार में आओ
वो चीज़ हूँ जो पस-ए-इश्तिहार रहती है

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