नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि ॥
इकि आवहि इकि जावही पूरि भरे अहंकारि ॥
मनहठि मती बूडीऐ गुरमुखि सचु सु तारि ॥१॥
गुर बिनु किउ तरीऐ सुखु होइ ॥
जिउ भावै तिउ राखु तू मै अवरु न दूजा कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
आगै देखउ डउ जलै पाछै हरिओ अंगूरु ॥
जिस ते उपजै तिस ते बिनसै घटि घटि सचु भरपूरि ॥
आपे मेलि मिलावही साचै महलि हदूरि ॥२॥
साहि साहि तुझु समला कदे न विसारेउ ॥
जिउ जिउ साहबु मनि वसै गुरमुखि अम्रितु पेउ ॥
मनु तनु तेरा तू धणी गरबु निवारि समेउ ॥३॥
जिनि एहु जगतु उपाइआ त्रिभवणु करि आकारु ॥
गुरमुखि चानणु जाणीऐ मनमुखि मुगधु गुबारु ॥
घटि घटि जोति निरंतरी बूझै गुरमति सारु ॥४॥
गुरमुखि जिनी जाणिआ तिन कीचै साबासि ॥
सचे सेती रलि मिले सचे गुण परगासि ॥
नानक नामि संतोखीआ जीउ पिंडु प्रभ पासि ॥५॥१६॥(20)॥

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