नाटक-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

नाटक-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

 

घटती रहती हैं घटनाएं
होती रहती हैं दुर्घटनाएं
मरते और खपते रहते हैं लोग और दुनिया
बाल भी बांका नहीं होता किसी का
समाचारों का काम है आना और जाना
‘अखबार और टीवी यह सब
नहीं देगा तो फिर उसे पूछेगा कौन?’
यह टिप्पणी होती है उसकी
जिसके पाषाण हृदय में नहीं फूटती
कभी करुणा, दया व अपनत्व की फुहार….
जिसको नहीं पड़ा संयोग या सौभाग्यवश
कभी भी इस दौर से गुजरना

कहीं किसान
आत्महत्या करता है तो उससे किसी को क्या ?
किसी के बच्चों को बघेरा मार ले जाता है
तो उसको, इसको या हमको क्या ?
किसी का जांबाज बेटा वतन की खातिर
हो जाता है सीमा पर शहीद
तो किसी को क्या ?

लेकिन
जब टूटता है छोटा सा भी
दुखों का पहाड़ हम पर
तो बौखला उठते हैं हम
गोया इस सदी का सबसे बड़ा
हादसा हुआ हो हमारे साथ
लेकिन दूसरे के बड़े से बड़े हादसे को भी
तुच्छ मानने के आदी हम
नहीं जानते परायों और असहायों का दर्द

दर्द का अहसास
तभी होता है सच्चा व अनुभूतिपरक
जब इसकी तपाक व (सीधी-सीधी) मार
पड़ती है अपने नाजुक कंधों पर
अन्यथा दूसरों का दर्द भी
हंसी-खुशी का खेल दिखाई देता है हमें

एक अपरिचित
कुत्ते के दुख में
दुखी होने लग जाता है दूसरा कुत्ता
लेकिन एक जख्मी मनुष्य को
मौत से जूझता छोड़ जाता है
अकेले सड़क पर दूसरा मनुष्य
क्या बचा है हममें मनुष्य कहलाने का प्रतिमान
जो हमें नहीं आंदोलित करतीं
किसी अपने जैसे दूसरे
इंसान के दुखों की चीखें

यदि
सीख जाए धरती पर
अपने में धार्मिकता की कृत्रिमता ओढ़े
मनुष्य, यह सब तो
सच में, उसे आ जाए मनुष्य से आदमी होना
अन्यथा सहज ही लगता है
आदमी के रूप में निरंतर उसका
ईश्वर का नाटक करते रहना ।

 

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