नाकाम होने की भी इंतहा हो चली-गुरसिमरन सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gursimran Singh

नाकाम होने की भी इंतहा हो चली-गुरसिमरन सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gursimran Singh

अब तो नाकाम होने की भी इन्तहा हो चली
खुद से पूछूँ यही कि जा रहा किस गली
यूं तो गलत नहीं दी जाती तेरी दरियादिली कि मिसालें
अपने आप से लड़ सकूँ, दम इतना भी नहीं मुझमें
गिरते रहने का सिलसिला ये थम ना रहा
चलते रहने की कोशिश में आज फिर गिर पड़ा
पैरों के निशां देखे खुद के जो पलट के
मंज़र ऐसा दिखा, खुद पे ही यकीं ना रहा

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