नाकहीन मुखड़ा-सतरंगे पंखोंवाली -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

नाकहीन मुखड़ा-सतरंगे पंखोंवाली -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

गठरी बना गई
माघ की ठिठुरन
अद्भुत यह सर्वांग-आसन

हिली-डुली
वो देखो हिली-डुली गठरी
दे गया दिखाई झबरा माथा
सुलग उठी माबिस की तीली
बीड़ी लगा धूंकने नाकहीन मुखड़ा
आँखों के नीचे
होठों के ऊपर
दो बड़े छेद थे
निकला उन छिद्रों से
धुआँ ढेर-ढर सा
अँधेरे में डूब गई ठूँठ बाँह
सहलाते-सहलाते गर्दन
डूब गया सब कुछ अंधेरे में…
शायद दुबारा खिंच जाय कस
चमके शायद दुबारा बीड़ी का सिरा

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