नहुष-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush

नहुष-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush

नहुष
‘‘नारायण ! नारायण ! साधु नर-साधना,
इन्द्र-पद ने भी की उसी की शुभाराधना।’’
बोल उठी नारद की वल्लकी गगन में,
जा रहे थे घूमने वे गंगातीर वन में ।

उस स्वर-लहरी में लोट उठा गन्धवाह,
चाह की-सी आह उठी किन्तु वन वाह वाह ?
चौंक अप्सराएं उठ बैठीं और झूमीं वे,
नूपुर बजा के ताल ताल पर घूमीं वे!

किन्तु शची विमना, क्या देखती क्या सुनती,
कितने विचार-सूत्र लेकर थी बुनती,
देव-ॠषि आप उसे देखा किये रुक के,
उसने प्रणाम उन्हें क्यों न किया झुक के?

दुर्वासा न थे वे यही बात थी कुशल की,
क्रोध नहीं, खेद हुआ और दया झलकी ।
“क्षम्य है विपन्ना, दयनीय यह दोष है,
स्वस्थ रहे कैसे गया, धाम-धन-कोष है ।

लज्जानत नेत्र, यह देखे-पहचाने क्या,
भीतर है कोलाहल, बाहर की जाने क्या?
ओहो!” क्षण मौन रहे फिर हिल डोले वे,
सहज, विनोदी, आप अपने से बोले वे…

“फिर भी प्रणाम बिना आशीर्वाद कैसे हो?
और अपराध अपराध ही है, जैसे हो ।
प्रायश्चित रुप कुछ दण्ड नहीं पायगा,
तो हे दये! दूषित ही दोषी रह जायगा।

मैं अपनी ओर से करूँगा कुछ भी नहीं,
किन्तु रुके विधि के अदृश्य कर भी कहीं?
मानता हूं सारे परिणाम मैं उचित ही।
रहता निहित है अहित में हित ही।

देख ली शची की दशा; अबला है अन्त में,
तस्कर-सा शक्र-दुरा बैठा है दिगन्त में ।
देखूँ नये इन्द्र का भी कैसा चमत्कार क्या?
मैं तो हूँ तटस्थ, यहाँ मौज मंझधार क्या?

विपिन नहीं तो आज इन्द्रोद्यान ही सही,
आवे जो अपने रस आप, अच्छा है वही ।
रस अभिनेता नहीं, दर्शक ही होने में,
ठौर तो मिलेगा ही मिलेगा किसी कोने में ।

वीणा बजी सप्त स्वर और तीन ग्राम में,
पहुँचे विचरते वे वैजयन्त धाम में ।
था सब प्रबन्ध यथा पूर्व भी नया नया,
ढीला पड़ा तन्त्र फिर तान-सा दिया गया ।

अभ्युत्थान देके नये इन्द्र ने उन्हें लिया,
मानी ने विनम्र व्यवहार विधि से किया।
”आज का प्रभात सुप्रभात, आप आये हैं,
दीजिए, जो आज्ञा स्वयं मेरे लिए लाये हैं!

उत्सुकता आगे चलती है सदा आपके,
विविध विषय पीछे विश्व-वार्तालाप के ।
सत्साहित्य, सत्संगीत दोनों ओर रहता,
लोकोत्तरानन्द दूना होकर है बहता ।”

आद्र जो है क्यों न वह आप ही बहे-बहे ।
मानस भी तो हो, जहाँ रस रमता रहे ।
धन्य है मनस्विता हमारे मनुजेन्द्र की,
रखते अमर भी हैं आशा इसी केन्द्र की!”

‘मेरा अहोभाग्ये’ “हां, तुम्हारा पुरुषार्थ है,
दुर्लभ तुम्हें क्या आज कोई भी पदार्थ है?”
“सीमा क्या यही है पुरुषार्थ की पुरुष के?”
मुद्रा कुछ उत्सुक थी मुख की नहुष के ।

मुनि मुसकाये और बोले-“यह प्रश्न? धन्य ।
कौन पुरुषार्थ भला इससे अधिक अन्य?
शेष अब कौन-सा सुफल तुम्हें पाने को?”
“फल से क्या, उत्सुक मैं कुछ कर जाने को ।”

“वीर करने को यहां स्वर्ग-सुख-भोग ही,
जिसमें न तो है जरा-जीर्णता, न रोग ही ।
साधन बड़ा है, किन्तु साध्य ही के अर्थ है,
अन्यथा प्रवृति-पथ सर्वथा ही व्यर्थ है ।

जोता और बोया फिर सींचा, फल छोड़ोगे?
जो है स्वयं प्राप्त क्या उसी से मुंह मोड़ोगे?”
बोला हंस नहुष-“समृद्धि स्वर्ग तक ही?
स्वर्ग जो न हो तो क्या ठिकाना है नरक ही?”-

“मर्त्य है, रसातल है, किन्तु है पतन ही;
मुक्ति-पथ भी है, वहाँ गृह भी है वन ही ।”
“पथिक उसी का जगती में यह जन था,
बीच में परन्तु वह नन्दन-भवन था?”

“देव राज्य-रक्षण भी कौन थोड़ा श्रेय है,
जिसका प्रसाद रूप प्राप्त यह पेय है ।
ऐसा रस पृथ्वी पर-” “मैंने नहीं पाया है,
यद्यपि क्या अन्त अभी उसका भी आया है?

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