नहीं जाता किसी से वो मरज़, जो है नसीबों का-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

नहीं जाता किसी से वो मरज़, जो है नसीबों का-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

नहीं जाता किसी से वो मरज़, जो है नसीबों का
न कायल हूं दवा का मैं, न कायल हूं तबीबों का

न शिकवा दुश्मनों का है, न है शिकवा हबीबों का
शिकायत है तो किसमत की, गिला है तो नसीबों का

हम अपने कुंजे-ग़म में नाला-ओ-फ़रियाद करते हैं
हमें क्या, गर चमन में चहचहा है, अन्दलीबों का

जो ज़ाहर पास हों दिन-रात और वो दूर हों दिल से
बईदों से ज़्यादा हाल समझो उन करीबों का

नहीं कालीनों-नमगीरा से मतलब, ख़ाकसारी को
ज़मीनो-आसमां है फ़रशो-ख़ेमा, इन ग़रीबों का

किया है बेअदब ख़ालिक ने पैदा, ऐ ‘ज़फ़र’ जिनको
करे क्या फ़ायदा उनको, अदब देना अदीबों का

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