नर होकर कर फैलाता है-लहर पुकारे -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

नर होकर कर फैलाता है-लहर पुकारे -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

नर होकर कर फैलाता है ?

का फैलाने से जो मिलता,
इन्द्रासन, सुख-स्वर्ग, अमरता,
खंडहर भी तो एक बार उसके वैभव पर मुसकाता है !
नर होकर कर फैलाता है ?

पूर्ण अभी तुझमें अपनापन,
और भरा नस-नस में जीवन;
भीख माँगता तब मानव जब मानव उसका मर जाता है!
नर होकर कर फैलाता है ?

नयनों में भावना-भिक्षु भर,
मत जग के सन्मुख फैला कर,
निर्बल को मिलती न भीख पर सबल स्वर्ग-सुख भी पाता है ।
नर होकर कर फैलाता है ?

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