नदी के किनारे-इन दिनों -कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

नदी के किनारे-इन दिनों -कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

हाथ मिलाते ही
झुलस गई थीं उँगलियाँ

मैंने पूछा, “कौन हो तुम ?”

उसने लिपटते हुए कहा, “आग !”

मैंने साहस किया-
खेलूँगा आग से

धूप में जगमगाती हैं चीज़ें
धूप में सबसे कम दिखती है
चिराग़ की लौ।

कभी-कभी डर जाता हूँ
अपनी ही आग से
जैसे डर बाहर नहीं
अपने ही अन्दर हो।

आग में पकती रोटियाँ
आग में पकते मिट्टी के खिलौने।

आग का वादा-फिर मिलेंगे
नदी के किनारे।

हर शाम
इन्तजार करती है आग
नदी के किनारे।

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