नदी की बाँक पर छाया अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya, Part 4

नदी की बाँक पर छाया अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya Part 4

प्यार अकेले हो जाने

प्यार अकेले हो जाने का एक नाम है
यह तो बहुत लोग जानते हैं
पर प्यार अकेले छोड़ना भी होता है इसे
जो
वह कभी नहीं भूली
उसे जिसे मैं कभी नहीं भूला…

नयी दिल्ली, नवम्बर, 1980

 

हाथ गहा

हाँ, तुम्हारा हाथ मैं ने गहा
तुम्हारे हाथ को मेरा हाथ
देर तक लिये रहा:
पर एकाएक मैं ने देखा कि उस मेरे हाथ के साथ
मैं ही तो नहीं रहा…

लखनऊ, 14 नवम्बर, 1980

अलाव

माघ: कोहरे में अंगार की सुलगन
अलाव के ताव के घेरे के पार
सियार की आँखों में जलन
सन्नाटे में जब-तब चिनगी की चटकन
सब मुझे याद है: मैं थकता हूँ
पर चुकती नहीं मेरे भीतर की भटकन!

नयी दिल्ली, दिसम्बर, 1980

कुछ तो टूटे

मिलना हो तो कुछ तो टूटे
कुछ टूटे तो मिलना हो
कहने का था, कहा नहीं
चुप ही कहने में क्षम हो
इस उलझन को कैसे समझें
जब समझें तब उलझन हो
बिना दिये जो दिया उसे तुम
बिना छुए बिखरा दो-लो!

नयी दिल्ली, सितम्बर, 1980

इतिहास-बोध

इन्हें अतीत भी दीखता है
और भवितव्य भी
इस में ये इतने खुश रहते हैं
कि इन्हें यह भी नहीं दीखता!
कि उन्हें सब कुछ दीखता है पर
वर्तमान नहीं दीखता!
दान्ते के लिए यह स्थिति
एक विशेष नरक था
पर ये इसे अपना इतिहास-बोध कहते हैं!

लखनऊ, 14 नवम्बर, 1980

 कदंब कालिंदी (पहला वाचन)

टेर वंशी की
यमुना के पार
अपने-आप झुक आयी
कदम की डार।
द्वार पर भर, गहर,
ठिठकी राधिका के नैन
झरे कँप कर
दो चमकते फूल।
फिर-वही सूना अँधेरा
कदम सहमा
घुप कालिन्दी कूल!

भोर : लाली

भोर। एक चुम्बन। लाल।
मूँद लीं आँखें। भर कर।
प्रिय-मुद्रित दृग
फिर-फिर मुद्रांकित हों-
क्यों खोलें?
आँखें खुलती हैं। दिन। धन्धे।
खटराग।
ऊसर जो हो जाएगा पार
वही लाली क्या फिर आएगी?

नयी दिल्ली, दिसम्बर, 1980

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