नज़्में -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Nazmein part 1

नज़्में -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Nazmein part 1

अड़े कबूतर उड़े ख़याल

इक बोसीदा मस्जिद में
दीवारों मेहराबों पर
और कभी छत की जानिब
मेरी आँखें घूम रही हैं
जाने किस को ढूँड रही हैं
मेरी आँखें रुक जाती हैं
लोहे के उस ख़ाली हुक पर
जो ख़ाली ख़ाली नज़रों से
हर इक चेहरा देख रहा है
इक ऐसे इंसान का शायद
जो इक पंखा ले आएगा
लाएगा और दूर करेगा
मस्जिद की बे-सामानी को
ख़ाली हुक की वीरानी पर
मैं ने जब उस हुक को देखा
मेरी नन्ही फूल सी बेटी
मेरी आँखों में दौड़ आई
भोली माँ ने उस की
अपनी प्यारी राज-दुलारी बेटी के
दोनों कानों को
अपने हाथों से छेद दिया है
फूलों जैसे कानों में फिर
नीम के तिनके डाल दिए हैं
उम्मीदों आसों के सहारे
दिल ही दिल में सोच रही है
जब हम को अल्लाह हमारा
थोड़ा सा भी पैसा देगा
बेटी के कानों में उस दिन
बालियाँ होंगी बुंदे होंगे
मैं ने अनथक मेहनत कर के
पंखा एक ख़रीद लिया है
मस्जिद के इस ख़ाली हुक को
मैं ने पंखा सौंप दिया है
हुक में पंखा देख के मुझ को
होता है महसूस कि जैसे
मेरी बेटी बालियाँ पहने
घर की छत पर घूम रही है

(शाहदाबा)

उकताए हुए बदन

उम्र की ढलती हुई दोपहर में
ठंडी हवा के झोंके का एहसास भी
आदमी को ताज़ा-दम कर देता है
और अगर सच-मुच ख़ुनुक हवाएँ
थकन-नसीब जिस्म से खेलने लगें
तो शब की तारीकी ख़िज़ाब जैसी दिखाई देती है
आस-पास गर्दिश करता हुआ सन्नाटा
आरज़ूओं की गहमागहमी से गूँजने लगता है
ख़्वाब ताबीरों की तलाश में भटकने लगते हैं
बदन की उक्ताहटें चौपाल के शोर-शराबे में डूब जाती हैं
ढलते हुए सूरज की लाली से सुहाग जोड़े की ख़ुशबू
आने लगती है
लेकिन ख़्वाबीदा आरज़ूओं की शाहराह से गुज़रते हुए
लोग
अपनी मंज़िल का पता भूल जाते हैं
इसी पता भूलने को समाज
धर्म और मज़हब की आड़ ले कर
ऐसी बे-हूदा गालियाँ देता है
जो तवाइफ़ों के मोहल्लों में भी नहीं
सुनाई देतीं

(शाहदाबा)

पत्थर के होंट

कल रात
बारिश से जिस्म
और आँसुओं से
चेहरा भीग रहा था
उस के ग़म की पर्दा-दारी
शायद ख़ुदा भी करना चाहता था
लेकिन धूप निकलने के ब’अद
जिस्म तो सूख गया
लेकिन आँखों ने
क़ुदरत का कहना मानने से
भी
इंकार कर दिया
उस के उदास
होंट पत्थर के हो गए थे
और पत्थर मुस्कुरा नहीं सकते

(शाहदाबा)

मेरे स्कूल

मेरे स्कूल मिरी यादों के पैकर सुन ले
मैं तिरे वास्ते रोता हूँ बराबर सुन ले
तेरे उस्तादों ने मेहनत से पढ़ाया है मुझे
तेरी बेंचों ने ही इंसान बनाया है मुझे
ना-तराशीदा सा हीरा था तराशा तू ने
ज़ेहन-ए-तारीक को बख़्शा है उजाला तू ने
इल्म की झील का तैराक बनाया है मुझे
ख़ौफ़ को छीन के बेबाक बनाया है मुझे
तुझ से शफ़क़त भी मिली तुझ से मोहब्बत भी मिली
दौलत-ए-इल्म मिली मुझ को शराफ़त भी मिली
शफ़्क़तें ऐसी मिली हैं मुझे उस्तादों की
परवरिश करता हो जैसे कोई शहज़ादों की
तेरी चाहत में मैं इस दर्जा भी खो जाता था
तेरी बेंचों पे ही कुछ देर को सो जाता था

(शाहदाबा)

सफ़ेद सच

उस की उँगलियाँ हमेशा सच बोलती हैं
बड़ा यक़ीन था उसे अपनी उँगलियों पर
उन के सच्चे होने पर भी बड़ा नाज़ था
वो हमेशा अपनी उँगलियों को
बातों बातों में चूम लेती थी
एक दिन नादानी में उस ने
अपनी उँगलियाँ मेरे होंटों पर रख दीं
उस दिन से उस की उँगलियाँ सच नहीं बोलतीं
सिर्फ़ झूट बोलती हैं

(शाहदाबा)

ओल्ड गोल्ड

लायक़ औलादें
अपने बुज़ुर्गों को
ड्राइंगरूम के क़ीमती सामान की तरह रखती हैं
उन्हें पता है कि एंटीक को
छुपा कर नहीं रखा जाता
उन्हें सजाया जाता है

(शाहदाबा)

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर … पुराना इतवार मिला है

जाने क्या ढूँढने खोला था उन बंद दरवाजों को …

अरसा बीत गया सुने उन धुंधली आवाजों को …

यादों के सूखे बागों में जैसे
एक गुलाब खिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …
पुराना इतवार मिला है …

कांच की एक डिब्बे में कैद …
खरोचों वाले कुछ कंचे …

कुछ आज़ाद इमली के दाने …
इधर उधर बिखरे हुए …

मटके का इक चौकोर लाल टुकड़ा …
पड़ा बेकार मिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …
पुराना इतवार मिला है …

एक भूरी रंग की पुरानी कॉपी…
नीली लकीरों वाली …

कुछ बहे हुए नीले अक्षर…
उन पुराने भूरे पन्नों में …

स्टील के जंक लगे शार्पनर में पेंसिल का एक छोटा टुकड़ा …
गिरफ्तार मिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …
पुराना इतवार मिला है …

बदन पर मिटटी लपेटे एक गेंद पड़ी है …

लकड़ी का एक बल्ला भी है जो नीचे से छीला छीला है …

बचपन फिर से आकर साकार मिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …
पुराना इतवार मिला है …

एक के ऊपर एक पड़े …
माचिस के कुछ खाली डिब्बे …

बुना हुआ एक फटा सफ़ेद स्वेटर …
जो अब नीला नीला है …

पीला पड़ चूका झुर्रियों वाला एक अखबार मिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …
पुराना इतवार मिला है …

गत्ते का एक चश्मा है …
पीला प्लास्टिक वाला …

चंद खाली लिफ़ाफ़े बड़ी बड़ी डाक टिकिटों वाले …

उन खाली पड़े लिफाफों में भी छुपा एक इंतज़ार मिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …
पुराना इतवार मिला है …

पापा ने चार दिन रोने के बाद जो दी थी वो रुकी हुई घडी …

दादा जी के डायरी से चुराई गयी वो सुखी स्याही वाला कलम मिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …
पुराना इतवार मिला है …

कई बरस बीत गए …

आज यूँ महसूस हुआ रिश्तों को निभाने की दौड़ में भूल गये थे जिसे …

यूँ लगा जैसे वही बिछड़ा …
पुराना यार मिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …
पुराना इतवार मिला है …

आज उस बूढी अलमारी के अन्दर …. पुराना इतवार मिला है

पटवारी का फ़ीता

बया का घोंसला
परिन्दों की वह टेकनालोजी है
जिसकी नक़्ल करके इंसानों ने
ऊँची ऊँची इमारतें तामीर कीं
लेकिन बया के बच्चे अपने लिए नया घोंसला बनाते हैं
उन्हें अपने पुरखों की हवेली से डर लगता है
वह इंसानों की तरह ज़मीन की तक़सीम का खेल नहीं खेलते
इसलिए उनके यहाँ
कोई लेखपाल या तहसीलदार नहीं होता
वह अपना फ़ैसला ख़ुद करने के लिए आज़ाद होते हैं!

एहसास

कल
अचानक
बाज़ार से गुज़रते हुए
कंघियों की दुकान ने
मेरे पैर पकड़ लिये
मैं हैरान व परेशान था
कि
साठ के पेटे में पहुँचने के
क़रीब
आख़िर ऐसा क्यों हुआ
यह घुझे आखिर क्या होता जा रहा है
अब मैं उम्र बढ़ाने की दवाओं
पर औलादों से ज्यादा भरोसा
करने लगा हूँ
कंघियों की दुकान ने
आख़िर मुझे अब क्यों आवाज़ दी है
अब तो मेरे सर पर
बाल ढूँढ़ने पड़ते हैं

गुज़ारिश

जिस्म की बोली लगते समय वह
ज़्यादातर ख़ामोश रहती है
कोई मोल भाव
कोई तर्क वितर्क नहीं करती
एहतेजाज और शर्मिन्दगी को दूर रखती है
लेकिन वह किसी को भी अपने होंठ चूमने की इजाज़त
नहीं देती
जब कोई उसे बहुत मजबूर करता है
तो वह रोते बिलखते और हाथ जोड़ते हुए
सिर्फ़ इतना कहती है
कि
यह होंठ मैं किसी को दान कर चुकी हूँ
और बड़े लोग दान की हुई चीज़ें
कभी नहीं लेते।

कल आज और कल

कल
शहर की एक
ख़ूबसूरत
सड़क पे
एक बैलगाड़ी
कारों के दरम्यान दौड़ती हुई
बहुत अजीब सी लग रही थी
आज मैं अपने घर में
नये ख़यालात के बच्चों में घिरा
अपने आपको
इसी बैलगाड़ी का हिस्सा
समझ रहा हूँ
कल उन बच्चों को भी
बैलगाड़ी का हिस्सा बन जाना है
लेकिन
इस बात को
वह लोग कल ही समझेंगे
क्योंकि आज समझने के लिए नहीं होता
आज…
सिर्फ़ आज होता है!

मीडिया

अन्दर और बाहर के मौसम में कित्तना फ़र्क होता है
अखाबारात चीख़ने लगे
रेडियो और टेलीविज़न ने मुख़बिरी की रफ़्तार बढ़ा दी
फ़ोटोग्राफ़र हर दुखी मंज़र को
कैमरे में क़ैद करने लगे
सियासी गलियारों में सोग ओर जश्न का समाँ है
समाजी कार्यकर्ता
इमदाद बाँटने के नाम पर बटोर रहे हैं
आँधियों में जश्न का माहौल है
तूफ़ान ने पूरे शहर को बे दस्तो पा कर दिया
पेड़ पौधे ज़मीन का साथ छोड़ने पर मजबूर थे
लेकिन उसी होटल के एक कमरे में
दो मिलने और बिछड़ने वालों की कहानी तक
न ही अख़बार वाले पहुँचे
न ही टीवी चैनल
क्योंकि ख़बर तो मरने वालों का नसीब है
ज़िन्दा रह जाने वाले ख़बर का हिस्सा नहीं होते!

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