नज़्में -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Nazmein part 2

नज़्में -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Nazmein part 2

आख़िरी सच

चेहरे तमाम धुँदले नज़र आ रहे हैं क्यूँ
क्यूँ ख़्वाब रतजगों की हवेली में दब गए
है कल की बात उँगली पकड़ कर किसी की मैं
मेले मैं घूमता था खिलौनों के वास्ते
जितने वरक़ लिखे थे मिरी ज़िंदगी ने सब
आँधी के एक झोंके में बिखरे हुए हैं सब
मैं चाहता हूँ फिर से समेटूँ ये ज़िंदगी
बच्चे तमाम पास खड़े हैं बुझे बुझे
शोख़ी न जाने क्या हुई रंगत कहाँ गई
जैसे किताब छोड़ के जाते हुए वरक़
जैसे कि भूलने लगे बच्चा कोई सबक़
जैसे जबीं को छूने लगे मौत का अरक़
जैसे चराग़ नींद की आग़ोश की तरफ़
बढ़ने लगे अँधेरे की ज़ुल्फ़ें बिखेर कर
भूले हुए हैं होंट हँसी का पता तलक
दरवाज़ा दिल का बंद हुआ चाहता है अब
क्या सोचना कि फूल से बच्चों का साथ है
अब मैं हूँ अस्पताल का बिस्तर है रात है

(शाहदाबा)

ख़ुद-कलामी

क्या ज़रूरी है कि हम फ़ोन पे बातें भी करें
क्या ज़रूरी है कि हर लफ़्ज़ महकने भी लगे
क्या ज़रूरी है कि हर ज़ख़्म से ख़ुशबू आए
क्या ज़रूरी है वफ़ादार रहें हम दोनों
क्या ज़रूरी है दवा सारी असर कर जाए
क्या ज़रूरी है कि हर ख़्वाब हम अच्छा देखें
क्या ज़रूरी है कि जो चाहें वही हो जाए
क्या ज़रूरी है कि मौसम हो हमारा साथी
क्या ज़रूरी है सफ़र में कहीं साया भी मिले
क्या ज़रूरी है तबस्सुम यूँही मौजूद रहे
क्या ज़रूरी है हर इक राह में जुगनू चमकीं
क्या ज़रूरी है कि अश्कों को रवानी भी मिले
क्या ज़रूरी है कि मिलना ही मुक़द्दर ठहरे
क्या ज़रूरी है कि हर रोज़ मिलें हम दोनों
हम जहाँ गाँव बसाएँ वहाँ इक झील भी हो
क्या ज़रूरी है मोहब्बत तिरी तकमील भी हो

(शाहदाबा)

भिकारी

उस की बनाई हुई हर तस्वीर
अख़बारों की ख़बर बन जाती है
उस की हर पेंटिंग को इनआमात ललचाई हुई नज़रों से देखते हैं
उस के ब्रश से रंगों का रंग खिल जाता है
वो क़ुदरत के हर नज़्ज़ारे को
अपने रंग और ब्रश से क़ैद कर लेता है
लेकिन
उस की बीवी की कोख में
कोई तस्वीर नहीं होती
उस के ब्रश से आँगन की किलकारियां ना-वाक़िफ़ हैं
शायद इस मुसव्विर से
काएनात का सब से बड़ा मुसव्विर नाराज़ है

(शाहदाबा)

लिपस्टिक

उस की हर बात
हर इशारे
हर किनाए को मैं आसानी से
समझ लेता था
लेकिन पता नहीं क्यूँ उस ने
मेरे लिखे हुए पुराने ख़ुतूत में
सोए हुए बे-क़ुसूर लफ़्ज़ों को
अपनी लाल रंग की लिपस्टिक से
हरा करने की कोशिश की है
क्यूँ

(शाहदाबा)

एहतिसाबे गुनाह

एक दिन अचानक उसने पूछा
तुम्हें गिनती आती है
मैंने कहा हां
उसने पूछा पहाड़े
मैंने कहा हां ! हां !
फिर उसने फ़ौरन ही पूछा
हिसाब भी आता होगा
मैंने गुरुर से अपनी डिग्रियों के नाम लिए
उसने कहा बस ! बस !
अब मुझसे किये हुए वादों
की गिनती बता दो
मैं तुम्हे मुआफ कर दूंगी

(शाहदाबा)

सिन्धु सदियों से हमारे देश की पहचान है

सिन्धु सदियों से हमारे देश की पहचान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

पेड़-पौधों के हरे पत्तों को चमकाती हुई
फूल पर लेकिन कटोरों रंग ढलकाती हुई
अप्सरा उतरे जमीं पर ऐसे इठलाती हुई
पत्थरों से बात करती बोलती गाती हुई
अपनी लहरों में छिपाए बांसुरी की तान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

चांद तारे पूछते हैं रात भर बस्ती का हाल
दिन में सूरज ले के आ जाता है एक सोने का थाल
खुद हिमालय कर रहा है इस नदी की देखभाल
अपने हाथों से ओढ़ाया है इसे कुदरत ने शाल
कतरा-कतरा इस नदी का फौजियों की शान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

देश के दुख-सुख से इसका आज का रिश्ता नहीं
इसका पानी साफ है शफ्फाफ है खारा नहीं
आपने हैरत है अब तक इस तरफ देखा नहीं
जो सियासत ने बनाया है ये वो नक्शा नहीं
जो हमें कुदरत ने बख्शा है ये वो सम्मान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

सिन्धु को केवल नदी हरगिज न कहना चाहिए
देश की रग-रग में इसको रोज बहना चाहिए
कम से कम एक दिन यहां पर आके रहना चाहिए
जिन्दगी दु:ख भी अगर बख्शे तो सहना चाहिए
जिसने पानी पी लिया है सिन्धु का धनवान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

हर सिपाही दुश्मनों से जंग करता है यहां
जर्रा-जर्रा मौसमों से जंग करता है यहां
जिस्म ठंडी नागिनों से जंग करता है यहां
रोज मौसम हौसलों से जंग करता है यहां
देश पर कुर्बान होना फौजियों की शान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

बर्फ रेगिस्तान है लद्दाख जैसे करबला
बर्फ को पानी बना देता है लेकिन हौसला
नफरतों के बीज बोना है सियासी मशगला
आओ मिल-जुल कर करें हम लोग अब ये फैसला
देश पर दिल भी हमारा जान भी कुर्बान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

इस नदी को देश की हर एक कहानी याद है
इसको बचपन याद है इसको जवानी याद है
ये कहीं लिखती नहीं है मुंह जुबानी याद है
ऐ सियासत तेरी हर एक मेहरबानी याद है
अब नदी को कौन बतलाए ये पाकिस्तान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

रास्ता तकती है सिन्धु ऐसे सर खोले हुए
जैसे कोई रो रहा हो चश्मे तर खोले हुए
जैसे चिड़िया सो रही हो अपने पर खोले हुए
मुनतजिर बेटे की जैसे मां हो घर खोले हुए
जिनके बेटे फौज में हैं उनका ये बलिदान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

था कहां तक देश कल तक ये बताती है हमें
अपने आईने में ये माजी दिखाती है हमें
जान देना मुल्क पर सिन्धु सिखाती है हमें
मां की तरह अपने सीने से लगाती है हमें
जख्म है छाती पे लेकिन होंठ पर मुस्कान है
ये नदी गुजरे जहां से समझो हिन्दुस्तान है।

(शाहदाबा)

शाइर

मैं अपनी आँखों को बेचना चाहता था
लेकिन कभी कोई ढंग का
ख़रीदार नहीं मिला
हर शख़्स आँखों के साथ
मेरे ख़्वाब भी ख़रीदना चाहता था
लेकिन ख़्वाब ख़रीदे और बेचे कहाँ जाते हैं
फिर मैं अपने अधूरे ख़्वाबों को
तकमील के उबटन के बग़ैर
कैसे किसी को दे सकता था
दुल्हन ख़रीदी और बेची कहाँ जाती है
यह तो क़साई भी नहीं कर सकता
मैं तो शाइर था

स्पेयर पार्ट

कार ड्राइव करते हुए महसूस
हुआ कि इंजन का कोई “नट’ साथ
छोड़ गया है
साथ छोड़ने वाले ‘नट’
और हमसफ़र को तलाश नहीं किया जाता
बल्कि
इसका बदल तलाश किया जाता है
मैंने भी एक छोटे से कार मिस्त्री की
उम्मीदों से छोटी दुकान के किनारे
अपनी कार खड़ी कर दी
मिस्त्री पुराने नट बोल्ट से भरे डिब्बे में
मेरे लिए नट तलाश करता रहा
थोड़ी सी तलाश व जुस्तजू के बाद वह कामयाब हो गया
हमारी नेकियाँ भी आमाल के डिब्बे में ऐसे ही
पड़ी रहती हैं
और ब वक़्ते ज़रूरत
तक़दीर के इंजन को सीज़ होने से
बचा लेती हैं!

घर के आँगन की तरह…

हाथ उठाये हुए मग़मूम दुआ करते हैं
जो मसर्रत से हैं महरूम, दुआ करते हैं
टूटे बिखरे हुए मग़मूम दुआ करते हैं
तू सलामत रहे मा’सूम दुआ करते हैं

तेरी कोशिश से मुक़द्दर यूँ हमारा चमके
रात को जैसे फ़लक पर कोई तारा चमके

ख़ौफ़ो दहशत का चलन बढ़ के मिटाना है तुझे
बे घरों को भी किसी रोज़ बसाना है तुझे
आग नफ़रत की सलीक़े से बुझाना है तुझे
घर के आँगन की तरह मुल्क सजाना है तुझे

हाँ इसी मुल्क के सूरज की किरन है तू भी
मादरे हिन्द की बेटी है बहन है तू भी

तूने मज़हब की सियासत से बचाया ख़ुद को
फ़िरक़ा बन्दी की कसाफ़त से बचाया ख़ुद को
किसी ज़ालिम की हिमायत से बचाया ख़ुद को
ओछे लोगों की क़यादत से बचाया ख़ुद को

तूने ख़ुद्दारी का दरिया कभी रुकने न दिया
सर को ग़द्दारों के दरबार में झुकने न दिया

कच्चा साथ

बातों बातों में उसने
एक दिन मुझसे कहा
मुझे तो सोना पसन्द है
तुम्हें क्या पसन्द है
मैंने हँसते हुए कहा
जागना!
अगली ही शाम वह किसी दूसरे के साथ
पार्क की उस बेंच पर बैठी थी
जहाँ
उजाला बहुत कम होता है

मन्सूख मोआहिदा

कई सदियों की बहस, हुज्जत और तक़रार के बाद
आँधी और चराग़ में यह मोआहिदा हो ही गया
दोनों एक दूसरे का ख़याल रखेंगे
जितनी देर तक यह दिया जलेगा
हवा होंठों पर उंगली रखे रहेगी
और जब हवा फूल पत्तियों से छेड़खानी
करने के लिए निकलेगी
तब दिया जलेगा नहीं
दोनों इस समझौते पर मुतमइन दिखे
लेकिन जब समझौते के काग़ज़ पर दस्तख़त करने का
वक़्त आया
तो दोनों ने इस फ़ार्मूले को कुबूल करने से
इनकार कर दिया
यह बात समझ में दोनों के आ गई
कि ज़िन्दगी, छेड़छाड़ के बगैर
और समझौतों की ज़ंजीरों में जकड़ कर
ज़िन्दगी नहीं रह जाती
बल्कि उसकी मौत हो जाती
एक झुँझलाई हुई दोपहर में
एक पुरसुकून चिड़िया
इश्क़े पेचाँ की बेल से लिपटी हुई
शाम होने का इन्तज़ार कर रही है
मेरी मा’सूम आरज़ू की तरह
बे नाम आरज़ू की तरह
जिसके इन्तज़ार के मौसमों में
कभी शाम नहीं आई
इस पुरसुकून चिड़िया को कौन समझाये
कि दोपहर और शाम के बीच
कभी समाज शुक्रिये का रूप धार लेता है
और कभी शुक्र समाज बन कर टूट पड़ता है!

मेरे दरवाज़े पे लिख दो…

एक बे नाम सी चाहत के लिए आई थी
आप लोगों से मुहब्बत के लिए आई थी
मैं बड़े बूढ़ों की ख़िदमत के लिए आई थी
कौन कहता है हुकूमत के लिए आई थी

शजर-ओ-रंगो गुलो बू नहीं देखा जाता
शक की नज़रों से बहू को नहीं देखा जाता

रुख़्सती होते ही माँ बाप का घर भूल गई
भाई के चेहरों को बहनों की नज़र भूल गई
घर को जाती हुई हर राह गुज़र भूल गई
मैं वह चिड़िया हूँ कि जो अपना शजर भूल गई

मैं तो जिस देस में आयी थी वही याद रहा
हो के बेवा भी मुझे सिर्फ़ ‘पती’ याद रहा

नफ़रतों ने मेरे चेहरे से उजाला छीना
जो मेरे पास था इक चाहने वाला, छीना
सर से बच्चों के मेरे बाप का साया छीना
मुझसे गिरजा भी लिया मेरा शिवाला छीना

अब यह तक़दीर तो बदली भी नहीं जा सकती
मैं वह बेवा हूँ जो इटली भी नहीं जा सकती

सोनिया गाँधी

रुख़सती होते ही मां-बाप का घर भूल गयी।
भाई के चेहरों को बहनों की नज़र भूल गयी।
घर को जाती हुई हर राहगुज़र भूल गयी,
मैं वो चिडि़या हूं कि जो अपना शज़र भूल गयी।

मैं तो भारत में मोहब्बत के लिए आयी थी,
कौन कहता है हुकूमत के लिए आयी थी।

नफ़रतों ने मेरे चेहरे का उजाला छीना,
जो मेरे पास था वो चाहने वाला छीना।
सर से बच्चों के मेरे बाप का साया छीना,
मुझसे गिरजा भी लिया, मुझसे शिवाला छीना।

अब ये तक़दीर तो बदली भी नहीं जा सकती,
मैं वो बेवा हूं जो इटली भी नहीं जा सकती।

आग नफ़रत की भला मुझको जलाने से रही,
छोड़कर सबको मुसीबत में तो जाने से रही,
ये सियासत मुझे इस घर से भगाने से रही।
उठके इस मिट्टी से, ये मिट्टी भी तो जाने से रही।

सब मेरे बाग के बुलबुल की तरह लगते हैं,
सारे बच्चे मुझे राहुल की तरह लगते हैं।

अपने घर में ये बहुत देर कहाँ रहती है,
घर वही होता है औरत जहाँ रहती है।
कब किसी घर में सियासत की दुकाँ रहती है,
मेरे दरवाज़े पर लिख दो यहाँ मां रहती है।

हीरे-मोती के मकानों में नहीं जाती है,
मां कभी छोड़कर बच्चों को कहाँ जाती है?

हर दुःखी दिल से मुहब्बत है बहू का जिम्मा,
हर बड़े-बूढ़े से मोहब्बत है बहू का जिम्मा
अपने मंदिर में इबादत है बहू का जिम्मा।

मैं जिस देश आयी थी वही याद रहा,
हो के बेवा भी मुझे अपना पति याद रहा।

मेरे चेहरे की शराफ़त में यहाँ की मिट्टी,
मेरे आंखों की लज़ाजत में यहाँ की मिट्टी।
टूटी-फूटी सी इक औरत में यहाँ की मिट्टी।

कोख में रखके ये मिट्टी इसे धनवान किया,
मैंन प्रियंका और राहुल को भी इंसान किया।

सिख हैं, हिन्दू हैं मुलसमान हैं, ईसाई भी हैं,
ये पड़ोसी भी हमारे हैं, यही भाई भी हैं।
यही पछुवा की हवा भी है, यही पुरवाई भी है,
यहाँ का पानी भी है, पानी पर जमीं काई भी है।

भाई-बहनों से किसी को कभी डर लगता है,
सच बताओ कभी अपनों से भी डर लगता है।

हर इक बहन मुझे अपनी बहन समझती है,
हर इक फूल को तितली चमन समझती है।
हमारे दुःख को ये ख़ाके-वतन समझती है।

मैं आबरु हूँ तुम्हारी, तुम ऐतबार करो,
मुझे बहू नहीं बेटी समझ के प्यार करो।

(शाहदाबा)

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