नगर-शोभा -रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahim Nagar-Shobha Part 1

नगर-शोभा -रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahim Nagar-Shobha Part 1

आदि रूप की परम दुति, घट-घट रहा समाइ ।
लघु मति ते मो मन रसन, अस्‍तुति कही न जाइ ।।1।।

नैन तृप्ति कछु होतु है, निरखि जगत की भाँति ।
जाहि ताहि में पाइयै, आदि रूप की काँति ।।2।।

उत्‍तम जाती ब्राह्मनी, देखत चित्‍त लुभाय ।
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाय ।।3।।

परजापति परमेश्‍वरी, गंगा रूप-समान ।
जाके अंग-तरंग में, करत नैन अस्‍नान ।।4।।

रूप-रंग-रति-राज में, खतरानी इतरान ।
मानों रची बिरंचि पचि, कुसुम कनक मैं सान ।।5।।

पारस पाहन की मनो, धरै पूतरी अंग ।
क्‍यों न होई कंचल पहू, जो बिलसै तिहि संग ।।6।।

कबहुँ दिखावै जौहरिन, हँसि हँसि मानिक लाल ।
कबहूँ चख ते च्‍वै परै, टूटि मुकुत की माल ।।7।।

जद्यपि नैननि ओट है, बिरह चोट बिन घाइ ।
पिय उर पीरा ना करै, हीरा सी ग‍ड़ि जाइ ।।8।।

कैथिनी कथन न पारई, प्रेम-कथा मुख बैन ।
छाती ही पाती मनो, लिखै मैन की सैन ।।9।।

बरूनि-बार लेखनि करै, मसि काजरि भरि लेइ ।
प्रेमाखर लिखि नैन ते, पिय बाँचन को देह ।।10।।

चतुर चितेरिन चित हरै चख खंजन के भाइ ।
द्वै आधौ करि डारई, आधौ मुख दिखराइ ।।11।।

पलक न टारै बदन तें, पलक न मारै नित्र ।
नेकु न चित तें ऊतरै, ज्‍यों कागद में चित्र ।।12।।

सुरंग बरन बरइन बनी, नैन खवाये पान ।
निसि दिन फेरै पान ज्‍यों, बिरही जन के प्रान ।।13।।

पानी पीरी अति बनी, चंदन खौरे गात ।
परसत बीरी अधर की, पीरी कै ह्वै जात ।।1411

परम रूप कंचन बरन, सोभित नारि सुनारि ।
मानों साँचे ढारि कै, बिधिना गढ़ी सुनारि ।।15।।

रहसनि बहसनि मन हरै, घेरि घेरि तन लेहि ।
औरन को चित चोरि कै, आपुन चित्‍त न देहि ।।16।।

बनिआइन बनि आइ कै, बैठि रूप की हाट ।
पेम पेक तन हेरि कै, गरुए टारत बाट ।।17।।

गरब तराजू करत चख, भौंह मोरि मुसक्‍यात ।
डाँड़ी मारत बिरह की, चित चिन्‍ता घटि जात ।।18।।

रँग रेजिन के संग में, उठत अनंग तरंग ।
आनन ऊपर पाइयतु, सुरत अंत के रंग ।।19।।

मारति नैन कुरंग तैं, मो मन मार मरोरि ।
आपुन अधर सुरंग तैं, कामिहिं काढ़ति बोरि ।।20।।

गति गरूर गजराज जिमि, गोरे बरन गँबारि ।
जाके परसत पाइयै, धनवा की उनहारि ।।21।।

घरो भरो धरि सीस पर, बिरही देखि लजाइ ।
कूक कंठ तैं बाँधि कै, लेजू ज्‍यों लै जाइ ।।22।।

भाटा बरन सुकौंजरी, बेचै सोवा साग ।
निलजु भई खेलत सदा, गारी द दै फाग ।।23।।

हरी भरी डलिया निरखि, जो कोई नियरात।
झूठे हू गारी सुनत, साँचेहू ललचात ।।24।।

बनजारी झुमकत चलत, जेहरि पहिरै पाइ ।
वाके जेहरि के सबद, बिहरी जिय हर जाइ ।।25।।

और बनज ब्‍यौपार को, भाव बिचारै कौन ।
लोइन लोने होत है, देखत वाको लौन ।।26।।

बर बाँके माटी भरे, कौंरी बैस कुम्‍हारि ।
द्वै उलटै सरवा मनौ, दीसत कुच उनहारि ।।27।।

निरखि प्रान घट ज्‍यों रहै, क्‍यों मुख आवै बाक ।
उर मानौं आबाद है, चित्‍त भ्रमैं जिमि चाक ।।28।।

बिरह अगिन निसि दिन धवै, उठै चित्‍त चिनगारि ।
बिरही जियहिं जराइ कै, करत लुहारि लुहारि ।।29।।

राखत मो मन लोह-सम, पारि प्रेम घन टोरि ।
बिरह अगिन में ताइकै, नैन नीर में बोरि ।।30।।

कलवारी रस प्रेम कों, नैनन भरि भरि लेति ।
जोबन मद माती फिरै, छाती छुवन न देति ।।31।।

नैनन प्‍याला फेरि कै, अधर गजक जब देइ ।
मतवारे की मत हरै, जो चाहै सो लेइ ।।32।।

परम ऊजरी गूजरी, दह्यौ सीस पै लेइ ।
गोरस के मिस डोलही, सो रस नेकु न देइ ।।33।।

गाहक सों हँसि बिहँसि कै, करति बोल अरु कौल ।
पहिले आपुन मोल कहि, क‍हति दही को मोल ।।34।।

काछिनि कछू न जानई, नैन बीच हित चित्‍त ।
जोबन जल सींचति रहै, काम कियारी नित्‍त ।।35।।

कुच भाटा, गाजर अधर, मूरा से भुज भाइ ।
बैठी लौका बेचई, लेटी खीरा खाइ ।।36।।

हाथ लिये हत्‍या फिरै, जोबन गरब हुलास ।
धरै कसाइन रैन दिन बिरही रकत पियास ।।37।।

नैन कतरनी साजि कै, पलक सैन जब देइ ।
बरुनी की टेढ़ी छुरी, लेह छुरी सो टेइ ।।38।।

हियरा भरै तबाखिनी, हाथ न लावन देत ।
सुरवा नेक चखाइकै, हड़ी झारि सब देत ।।39।।

अधर सुधर चख चीकनै, दूभर हैं सब गात ।
वाको परसो खात हू, बिरही नहिं न अघात ।।40।।

बेलन तिली सुबासि कै, तेलिन करै फुलैल ।
बिरही दृष्टि फिरौ करै, ज्‍यों तेली को बैल ।।41।।

कबहूँ मुख रूखौ किये, कहै जीय की बात ।
वाको करुआ बचन सुनि, मुख मीठो ह्वै जात ।।42।।

पाटम्‍बर पटइन पहिरि, सेंदुर भरे ललाट ।
बिरही नेकु न छाँड़ही, वा पटवा की हाट ।।43।।

रस रेसम बेंचत रहै, नैन सैन की सात ।
फूंदी पर को फोंदना, करै कोटि जिय घात ।।44।।

भटियारी अरु लच्‍छमी, दोऊ एकै घात ।
आवत बहु आदर करै, जात न पूछै बात ।।45।।

भटियारी उर मुँह करै, प्रेम-पथिक के ठौर ।
द्यौस दिखावै और की, रात दिखावै और ।।46।।

करै गुमान कमाँगरी, भौंह कमान चढ़ाइ ।
पिय कर गहि जब खैंचई, फिरि कमान सी जाइ ।।47।।

जोगति है पिय रस परस, रहै रोस जिय टेक ।
सूधी करत कमान ज्‍यों, बिरह-अगिन में सेंक ।।48।।

हँसि हँसि मारै नैन-सर, बारत जिय बहु पीर ।
बेझा ह्वै उर जात है, तीरगरिन कै तीर ।।49।।

प्रान सरीकन साल दै, हेरि फेरि कर लेत ।
दुख संकट पै का‍ढि के, सुख सरेस में देत ।।50।।

छीपिन छापौ अधर को, सुरँग पीक भरि लेइ ।
हँसि हँसि काम कलोल में, पिय मुख ऊपर देइ ।।51।।

मानों मूरति मैन की, धरै रंग सुरतंग ।
नैन रंगीले होतु हैं, देखत वाको रंग ।।52।।

सकल अंग सिकलीगरिन, करत प्रेम औसेर ।
करै बदन दर्पन मनों, नैन मुसकिला फेरि ।।53।।

अंजनचख, चंदन बदन, सोभित सेंदुर मंग ।
अंगनि रंग सुरंग कै, काढ़ै अंग अनंग ।।54।।

करै न काहू की संका, सक्किन जोबन रूप ।
सदा सरम जल तें भरी, रहै चिबुक को कूप ।।55।।

सजल नैन वाके निरखि, चलत प्रेम रस फूटि ।
लोक लाज डर धाकते, जात मसक सी छूटि ।।56।।

सुरँग बसन तन गाँधिनी, देखत दृग न अघाय ।
कुच माजू, कुटली अधर, मोचत चरन न आय ।।57।।

कामेश्‍वर नैननि धरै, करत प्रेम की केलि ।
नैन माहि चोवा भरे, चिहुरन माहिं फुलेल ।।58।।

राज करत रजपूतनी देस रूप की दीप ।
कर घूँघट पट ओट कै, आवत पियहि समीप ।।59।।

सोभित मुख ऊपर धरै, सदा सुरत मैदान ।
छूटी लटैं बँदूकची, भोंहें रूप कमान ।।60।।

चतुर चपल कोमल बिमल, पग परसत सतराइ ।
रस ही रस बस कीजियै, तुरकिन तरकि न जाइ ।।61।।

सीस चूँदरी निरखि मन, परत प्रेम के जार ।
प्रान इजारो लेत है, वाको लाल इजार ।।62।।

जोगिन जोग न जानई, परै प्रेम रस माँहि ।
डोलत मुख ऊपर लिये, प्रेम जटा की छाँहि ।।63।।

मुख पै बैरागी अलक, कुच सिंगो विष बैन ।
मुदरा धारै अधर कै, मूँदि ध्‍यान सों नैन ।।64।।

 

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