नंदो बाजीगरनी-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

नंदो बाजीगरनी-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

सुई छोटी बड़ी, फरई की
आवाज़ लगाती नंदो बाजीगरनी
अब हमारे
गाँव की गलियों से कभी नहीं गुजरती
शायद मर गई होगी
छोटी बच्चियों के कान-नाक छेदकर
पिरो देती थी झाड़ू का पाक-साफ तिनका
कहती
सरसों के तेल में हल्दी मिलाकर
लगाते रहना
अगली बार आती तो
पीतल के कोके, बालियां
कानों में डालकर कहती
बेटी
बड़ी हो गई।

नंदो औरतों की आधी वैद्य थी
पेट दुखने पर चूरन
आँख आने पर काजल डालती
खरल में काजल पिसती
सब के सामने
रड़कने लायक कुछ नहीं छोड़ती
धरन पड़ी हो तो
पेट मलते हुए कहती
कौडी हिल गई है
वजन मत उठाना बीबी जी
पैरों के बल बैठ के
दूध न निकालना।
बहुत कुछ जानती थी नंदो
आधी-अधूरी धनवंतरी वैद्य ही थी।

नंदो बाजीगरनी
बिन बैटरी के चलता रेडियो थी
चलता फिरता
बिना शब्दों का लोकल खबरों वाला अखबार थी।
नंदो की चादर में
सिमटे थे बीस तीस गाँव
पूछती सबसे सबका सुख-दुख, अपना कभी न कहती।
दिये की लौ सी चमकती आँखों वाली नंदो
भले-बुरे का भेद समझती
सारे गाँव को
नियत की बदनियत और शुभनियत के बारे आगाह करती।

नंदो न होती तो
कितनी ही बहन-बेटियों को
कोरी चादर पर
मोर, कबूतरी की
कढ़ाई करनी सीख न पाती।
वो धिआनपुर से
पक्के रंग वाले
मजबूत धागों के लच्छे लाती

माँ से लस्सी का गिलास पकड़ते
रात की बची रोटी ही माँगती
ताजी पकी कभी नहीं खाती
कहती! आदत बिगड़ जाती है
बहन तेज कौरे
हर गाँव में तो नहीं हैं न तेरे जैसी।
चौंके में माँ के पास बैठी
बच्चों का माथा
गौर से देखकर कहती
स्कूल नहीं गया? बुखार है।
चरखे की फरई से कालिख ले
मुझ जैसों के कान के पीछे लगा
कहती ‘बुखार की ऐसी की तैसी’
रास्ता भूल जाएगा बेटा ताप!
सुबह शरीर फूल सा हल्का होता
मैं चल पड़ता स्कूल बस्ता उठाए।
मोटी सिलाई से बनी नंदो की
बगल पोटली में पूरा संसार था।
हर एक के लिए कुछ न कुछ अलग
प्रेमियों के लिए पीतल की अंगूठियां-छल्ले
छोटे बच्चों के लिए
चावलों वाले झुनझुने, पीपनियाँ, बाजे
दीन शाह की कुटिया वाले बाग से
लाए मोतिये के सुच्चे पुष्प हार
मेरी माँ को देकर कहती
महकता रहे तेरा परिवार गुलज़ार
दुआएँ बाँटती बिना दाम।
मुट्ठी-मुट्ठी भर आटे से
भरती अपनी पोटली,
बाँटती कितना कुछ।
घास के तिनकों से
अँगूठी बुनना
मुझे उसी ने सिखाया था।
किताबों ने वो हुनर तो भुलवा दिया
पर अब मैं शब्द बुनता हूँ
अक्षर-अक्षर घास के तिनकों से।
नंदो का कोई गाँव नहीं था
बेनाम टपरियां थी।
शीर्षक नहीं था कोई
पर नंदो बंजारन
घर-घर की कहानी थी।
हमारे स्कूल के पास ही थी
नंदो की टपरियां
पर एक भी बच्चा स्कूल नहीं आता था।
सदा कहती,
हमारी झोपड़ियाँ तोड़ कर बनी
हमारी निशानी बरगद ही है बस
बाकी सब कुछ पैसे वालों का।
ज्ञान के नाम पर दुकानें
गरीबों की दुश्वारियां और दंड।
हमारे लोग तो
इसके नलके से पानी भी नहीं भरते।
तलैया का पानी मंजूर,
ये जहर सा लगता है हमें।
हमारी अपनी भाषा है भाई
ये स्कूल हमारी बोली बिगाड़ देगा।
बच्चों को भुलवा देगा बाजीगिरी।
सुडौल जिस्म के सपने को कोढ़ कर देगा।
तांगे में जुता घोड़ा बना
चारों तरफ देखने से रोक देगा।

नंदो बताया करती हम बाजीगरों की अपनी पंचायत है सरदारों
हम तुम्हारी कचहरियों में
नहीं चढ़ते।
हमारे बुजुर्ग इंसाफ करते हैं
फैसले नहीं।
तुम्हारी अदालतों में फैसले होते हैं।
सूरज गवाह है
अँधेरा उतरने से पहले
टपरियों में हमारा पहुँचना ज़रूरी है।
रात हुई तो बस बात गई,
अक्सर इतना सा कहकर
वो बहुत कुछ समझा जाती।
पर हमें कुछ समझ न आता।
बताते हैं
नंदो की टपरियों, झुग्गियों का
पंचायती नाम
लालपुरा रखा है।
पर वो अब भी
बाजीगरों की बस्ती कहलाती है।
बरसों पुरानी नंदो मर चुकी है
पर बेटे तो ज़िंदा हैं।

 

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