नंगे अपने नंगेपन को-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

नंगे अपने नंगेपन को-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

 

नंगे अपने नंगेपन को,
ऐसे नंगा करते हैं।

जैसे विवशता न पहचाने,
अपनों की छाती दलते है।।

सर्वे भवन्तु सुखिन: क्या जाने,
भक्ति गिद्ध से ही करते हैं।।

जिस धरती का अन्न है खाते,
गद्दारी सिद्ध उसी से करते हैं ।।

विवेकानंद की वाणी को,
छोड़ के दंगा करते हैं।।

नंगे अपने नंगेपन को,
ऐसे नंगा करते हैं।

यदा यदा ही धर्मस्य के देश मे,
वे ही संन्यासी मार गये।।

जाहिल अपने जाहिलपन में,
इसको उसको तार गये।

अब्दुल कलाम के आदर्शों को,
दिनभर गंदा करते हैं।।

नंगे अपने नंगेपन को,
ऐसे नंगा करते हैं।

जब मुंह खोले जब जब बोले
हर वक्त कुन्ठा सी लगती है।

ये धरती पर जीवित है कैसे,
हमीद की उत्कंठा सुलगती है।।

आजाद की आजादी को,
नंगा बस नंगा करते हैं।

नंगे अपने नंगेपन को,
ऐसे नंगा करते हैं।

 

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