ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ ॥
खेती जिन की उजड़ै खलवाड़े किआ थाउ ॥
सचै सरमै बाहरे अगै लहहि न दादि ॥
अकलि एह न आखीऐ अकलि गवाईऐ बादि ॥
अकली साहिबु सेवीऐ अकली पाईऐ मानु ॥
अकली पड़्हि कै बुझीऐ अकली कीचै दानु ॥
नानकु आखै राहु एहु होरि गलां सैतानु ॥१॥(1245)॥

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