ध्रिगु जीवणु दोहागणी मुठी दूजै भाइ-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

ध्रिगु जीवणु दोहागणी मुठी दूजै भाइ-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

ध्रिगु जीवणु दोहागणी मुठी दूजै भाइ ॥
कलर केरी कंध जिउ अहिनिसि किरि ढहि पाइ ॥
बिनु सबदै सुखु ना थीऐ पिर बिनु दूखु न जाइ ॥१॥
मुंधे पिर बिनु किआ सीगारु ॥
दरि घरि ढोई न लहै दरगह झूठु खुआरु ॥१॥ रहाउ ॥
आपि सुजाणु न भुलई सचा वड किरसाणु ॥
पहिला धरती साधि कै सचु नामु दे दाणु ॥
नउ निधि उपजै नामु एकु करमि पवै नीसाणु ॥२॥
गुर कउ जाणि न जाणई किआ तिसु चजु अचारु ॥
अंधुलै नामु विसारिआ मनमुखि अंध गुबारु ॥
आवणु जाणु न चुकई मरि जनमै होइ खुआरु ॥३॥
चंदनु मोलि अणाइआ कुंगू मांग संधूरु ॥
चोआ चंदनु बहु घणा पाना नालि कपूरु ॥
जे धन कंति न भावई त सभि अड्मबर कूड़ु ॥४॥
सभि रस भोगण बादि हहि सभि सीगार विकार ॥
जब लगु सबदि न भेदीऐ किउ सोहै गुरदुआरि ॥
नानक धंनु सुहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥५॥१३॥(18)॥

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