धूसर वसंत-नदी की बाँक पर छाया अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

धूसर वसंत-नदी की बाँक पर छाया अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

वसन्त आया है
पतियाया-सा सभी पर छाया है
हर जगह रंग लाया है
पर यह देख कर कि कीकर भी पियराया है
मेरा मन एकाएक डबडबा आया है।
नहीं, इस बार, मेरे मीत!
नहीं उमड़ेगी धार
मैं नहीं गा सकूँगा गीत
इस बार, बस, घुमड़ेगा प्यार
और चुप में रिस जाएगा
बहेगी नहीं बयार न सिहराएगी
इस बार चिनचिनाती आँधी आएगी
घुटूँगा मैं और फूले भी बबूल को
धूसर कर जाएगी
धूल, धूल, धूल…

नयी दिल्ली, मार्च 1980

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